
रेणु परसरामपुरिया, मुंबई
आजकल कौड़ियाँ बड़ी चर्चा में हैं। मुझे तो बचपन के वे दिन याद आ गए, जब हम सब बच्चे गर्मी की छुट्टियों में कौड़ियाँ इकट्ठी करके खेला करते थे। उनकी खनक आज भी कानों में गूँजती है। कौड़ियों की आवाज़ किसी मधुर संगीत से कम नहीं लगती थी।
सोशल मीडिया में डूबे रहने वाले आजकल के बच्चे क्या जानें कौड़ियों की खनक! शायद इसी वजह से कौड़ियों ने मिलकर यह फैसला किया होगा कि चलो, एक बार फिर अपना जलवा दिखा देते हैं। बस फिर क्या था, अपनी ताकत का एहसास कराने के लिए उनके प्रिय शिक्षक का मोलभाव कौड़ियों के दाम में कर दिया गया। फिर तो कौड़ियाँ जो खनकीं, रुकने का नाम ही नहीं ले रही हैं।
पत्रकार और शिक्षक, जो किसी भी सभ्य समाज के दो आधार स्तंभ होते हैं, उन्हें कौड़ियों ने आमने-सामने खड़ा कर दिया है। मामला कोर्ट-कचहरी तक पहुँच गया है। शायद कौड़ियों ने भी नहीं सोचा होगा कि बात इतनी बढ़ जाएगी।
एक दिन पूजा-सामग्री की दुकान में हल्की-सी फुसफुसाहट सुनाई दी। दो कौड़ियाँ आपस में बतिया रही थीं।
पहली कौड़ी ने कहा, “बहन, सुना है आजकल हमारी बड़ी चर्चाएँ हो रही हैं। जिसे देखो, वही हम पर टिप्पणी कर रहा है।”
दूसरी कौड़ी ने कहा, “हाँ, मैंने भी सुना है। किसी ने किसी को कौड़ी कह दिया और वे गुस्सा हो गए। हमें कौड़ी क्यों कह दिया? हम तो समाज के निर्माण में योगदान देती हैं। हमारी कीमत कम कर दी गई है।”
पहली कौड़ी बोली, “मेरी तो आज आँखें खुल गईं। मैं तो अपने आपको बहुत मूल्यवान समझती थी। हमारा प्रयोग पूजा-पाठ, वास्तुदोष निवारण और सकारात्मक ऊर्जा फैलाने में किया जाता है। हमें तो माता लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। मानसिक सुख-शांति और समृद्धि के लिए हमारा उपयोग होता है। फिर कौड़ी कहना बुरी बात कैसे हुई? यह तो सम्मान की बात है न?”
दूसरी कौड़ी ने सहमति जताते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रही हो तुम। इंसान के दिमाग को आज तक कोई समझ ही नहीं पाया है। कब कौन किस बात पर बिगड़ जाए, कुछ पता नहीं चलता।”
इतने में जाने कहाँ से एक कॉकरोच महाशय प्रकट हो गए और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। कौड़ियों को समझने में देर नहीं लगी कि महाशय हँस क्यों रहे हैं।
कौड़ियाँ भी कहाँ पीछे रहने वाली थीं! दोनों पक्ष अपना-अपना तर्क रख रहे थे। ज़ोरदार दलीलों का आदान-प्रदान हो रहा था।
अब तो बात आत्मसम्मान तक पहुँच गई थी।
कॉकरोच महाशय इतरा रहे थे, तो कौड़ियाँ भी गुस्से में तमतमा रही थीं।
खैर…
कॉकरोच अपनी जनसंख्या और बढ़ाने के बारे में विचार कर रहे हैं, मानो सरकार को टक्कर देने की तैयारी में हों। कौड़ियाँ सरकार से बचने के रास्ते खोज रही हैं। पत्रकार हिट्स बटोरने के लिए कॉकरोच के पीछे भाग रहे हैं और कौड़ियों को कानूनी दाँव-पेंच में उलझा दिया गया है।
रही बात सरकार की, तो उसे न कॉकरोचों की चिंता है और न ही कौड़ियों की।

रेनू जी वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक ढांचे पर करारा व्यंग लिखा है आपने।
ऐसे ही लिखते रहिए
जी शुक्रिया