
हेमा जोशी, स्वाति लोहाघाट, उत्तराखंड
नीला अम्बर, स्वच्छ पवन है,
सुंदर अपना यह वतन है।
बड़ी-बड़ी पर्वत-मालाएँ,
वृक्षों से आच्छादित हैं।
निरख-निरख शोभा सब इसकी,
पुलकित और आनंदित हैं।।
छल-छल करती नदियाँ बहतीं,
झर-झर झरने बहते हैं।
विचरण करते पशु-पक्षी सब,
प्यास बुझाते रहते हैं।।
लिए गोद में जैव-विविधता,
धरती माता सुशोभित है।
विविध भाँति के फूल-फलों से,
पुष्पित और पल्लवित है।।
स्वच्छ वायु और जल देकर,
जीवन सबको देती है।
उपकार करे हर पल मानव का,
बदले में कुछ नहीं लेती है।।
आज स्वार्थवश होकर मानव,
दोहन इसका कर रहा।
जिससे जीवन मिला सभी को,
उपकार उसी का भूल रहा।।
काट हरे-भरे वृक्षों को,
बना रहा कंक्रीट महल।
आग लगाकर आज वनों में,
धरती माँ को रहा दहल।।
कहीं पड़ रही भीषण गर्मी,
सर्दी की कहीं पर मार।
बदल गया है मौसम सारा,
मचा हुआ है हाहाकार।।
निर्मल सुंदर आँचल इसका,
मैला हमने आज किया।
कूड़े के सब ढेर लगाकर,
दूषित पर्यावरण किया।।
माफ करेगी कभी नहीं यह,
रूठेगी जब धरा महान।
उलट-पुलट कर धरणी को,
लील लेगी जीवन और जहान।।
आज समझना हमें इसे है,
इसका करो नहीं अपमान।
वृक्ष बचाओ और उगाओ,
निज जननी सम इसको जान।।
