
अंशु गुप्ता, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
दाम से जो बाँध दिया उदर,
कहलाने लगे नंदलाल दामोदर।
डाँट थी यशोदा मैया की,
लीला थी हमारे कन्हैया की।
ऐसे जो वे
रस्सी और ओखल से बंध गए,
मानो जैसे
ब्रह्मांड को चार चाँद लग गए।
छड़ी देखकर
कुंडल हिल रहे हैं,
विश्व में
पुष्प-सरोज खिल रहे हैं।
ये आनंद-कुंड का गोत है,
कृपा-सागर का स्रोत है।
सुसज्जित रूप से
ज़रा लज्जित हो उठे मेरे नेत्र हैं,
कमलरूपी मुख से
मिल रहा जो अपरम्पार सुख है।
नलकूबर और मणिग्रीव की मुक्ति
मिली तभी,
जब प्राप्त हुई हरि-भक्ति।
करुणा-सागर, कर्म-निधान,
भजूँ मैं तुमको
बारंबार।
तुम ही दीप्तिमान,
साथ ही तुम ही श्याम भी…
हाँ, कह देना
जब कहूँ-
आओ ना स्वामी…
आओ ना स्वामी…॥
