
बबिता सराफ भूपाल, सिलीगुड़ी
आई हूँ विदेशी धरा पर
कुछ सीखने, कुछ जानने,
पर अपने किस्सों के लिए
यहाँ कोई जगह तो नहीं।
स्वामी विवेकानंद की
यहाँ कोई निशानी नहीं दिखती,
आँखों में अब करुणा की
वो रवानी नहीं दिखती।
चेहरों पर नक़ाब हैं सब,
चालें भी बनावटी हैं,
न नूर है निगाहों में,
रौशनी भी दिखावटी है।
फिर भी उम्मीद की एक लौ
हर पल जलती रही,
अपनों की तलाश में
धड़कनें मचलती रहीं।
परदेस की इन ठंडी हवाओं में
कहीं वतन की सरगोशियाँ पलती रहीं।
थाम कर जज़्बात,
हर रात चाँद से बातें हुईं,
यादों की धुन में
भीगी-भीगी सी सौगातें हुईं।
कभी ख़्वाबों में
उजालों की कोई परछाईं मिली,
कभी तन्हाइयों में
अपनी धड़कनें थोड़ी खिलीं।
फिर भी एक सुकून था
कि कहीं दूर सही,
मौजूद है वतन की ख़ुशबू
जो हर सफ़र में मेरे साथ रही।
अनमोल थी यह अनुभूति,
और ये दिल मुसाफ़िर होकर भी
उसी दर पर रुका रहा,
जहाँ मोहब्बत की पहली किरण
मेरे माथे पर पलती रही।
विदेश की ठंडी हवाएँ
हड्डियों तक उतर आती हैं,
अकेली शामें भी
अपने साए संग ठिठुर जाती हैं।
पर इन बर्फ़ीली राहों में
एक उम्मीद गरमाहट देती है,
वतन का ख़याल ही
दिल को चुपके-चुपके ताप पहुँचाता है।
वतन का प्यार
हमें हिंदुस्तान की याद बहुत दिलाता है,
कानों में न जाने कब
कोई गीत-सा गुनगुना जाता है।
अब दिल कहता है
बस, अब और नहीं,
लौट जाओ…
अब लौट जाओ।
उस देश में,
जिसे कह सकते हैं हम
सिर्फ और सिर्फ अपना देश,
जहाँ साँसों में बसता है
मेरा भारत, मेरा परिवेश।
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जिजीविषा

बहुत ही सुंदर कविता 💕
बहुत सुन्दर