
सुरेश परिहार,पुणे
कुछ मजबूरियां इंसान को वक्त से पहले बड़ा बना देती हैं.वह उम्र, जिसमें बच्चे अपने भविष्य के रंग चुनते हैं, कुछ लोग उसी उम्र में अपने सपनों का अंतिम संस्कार कर देते हैं. बाहर से सब सामान्य दिखता है, लेकिन भीतर एक अधूरापन हर दिन चुपचाप मरता और जीता रहता है. मुझे बचपन में मेरे मामा ने मजबूरी का असली अर्थ समझाया था. उन्होंने अपने स्कूल के दिनों का एक किस्सा सुनाया था. स्कूल में गरीब बच्चों को किताबें और यूनिफॉर्म बांटी जानी थीं. टीचर ने पूरी क्लास से पूछा . गरीब कौन है?
पूरी क्लास की उंगलियां एक साथ मेरे मामा की तरफ उठ गईं. और शायद उस क्षण उन्हें खुद भी लगा कि वह सचमुच गरीब हैं, इसलिए वह भी चुपचाप खड़े हो गए. उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन उनकी आंखें भर आई थीं. वह आंसू सिर्फ गरीबी के नहीं थे, बल्कि उस मजबूरी के थे, जो इंसान को भीड़ के सामने छोटा कर देती है.
आज वर्षों बाद वही कहानी उस लड़की ने बताई. वह बता रही थी कि जब वह स्कूल में पढ़ती थी, तभी उसकी शादी तय कर दी गई थी. क्लास में किसी को इसकी खबर नहीं थी. एक दिन टीचर ने सभी बच्चों से पूछा . बड़े होकर क्या बनोगे?
किसी ने डॉक्टर बनने की बात कही.
किसी ने इंजीनियर बनने का सपना बताया.
किसी ने सीए बनने की इच्छा जताई.
लेकिन वह चुप रही….
उसने कोई जवाब नहीं दिया. बस धीरे से खड़ी हो गई. उसे लगा अगर वह अपने सपनों का नाम लेगी, तो लोग हंसेंगे. क्योंकि उसे भीतर ही भीतर पता था कि उसके सपनों की उम्र अब खत्म की जा चुकी है. उसकी आंखें भर आई थीं. वह भी कुछ बनना चाहती थी, लेकिन उसकी जिंदगी का फैसला उससे पहले ही लिया जा चुका था.उसने कहा, जब मेरी सहेलियां कॉलेज के सपने देख रही थीं, तब मेरे हाथों में जिम्मेदारियों की गठरी रख दी गई थी. बारहवीं का रिजल्ट आने से पहले ही मेरी सगाई हो चुकी थी.
लोग कहते थे कि लड़की का असली घर उसका ससुराल होता है. उस समय मैं इतनी छोटी थी कि विरोध करना भी नहीं आता था.उसकी बातें सुनते हुए ऐसा लग रहा था जैसे कोई लड़की नहीं, बल्कि अधूरे सपनों की आवाज बोल रही हो.शादी के बाद जब उसने नए घर में कदम रखा, तब लोग उसके चेहरे पर दुल्हन की मुस्कान देख रहे थे, लेकिन कोई यह नहीं देख पा रहा था कि उसी दिन उसका बचपन उससे छिन गया था. सुबह जल्दी उठना, रसोई संभालना, रिश्तेदारों की उम्मीदों पर खरा उतरना . यही उसकी नई दुनिया बन गई.लेकिन भीतर एक दूसरी दुनिया भी थी. एक ऐसी दुनिया, जहां वह अब भी अपने लिए कुछ करना चाहती थी. रात को जब सब सो जाते, तब वह छत पर जाकर आसमान देखती और सोचती . क्या हर लड़की का सपना इसी तरह अधूरा रह जाता है?
उसके भीतर लगातार एक संघर्ष चलता रहता था. एक तरफ जिम्मेदारियां थीं, दूसरी तरफ उसके सपने. एक तरफ परिवार की उम्मीदें थीं, दूसरी तरफ उसकी अपनी पहचान बनाने की छटपटाहट.
धीरे-धीरे उसने खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढाल लिया. उसने मुस्कुराना सीख लिया. रिश्ते निभाना सीख लिया. लेकिन उसने अपने भीतर की उस लड़की को कभी मरने नहीं दिया, जो कुछ कर दिखाना चाहती थी.
शादी के कुछ साल बाद बच्चे हुए. जिम्मेदारियां और बढ़ गईं. दिन घर के कामों में गुजरता और रात थकान में डूब जाती. लेकिन इन सबके बीच भी उसका सपना जिंदा रहा. कभी वह डायरी में दो लाइनें लिख लेती. कभी कोई गीत सुनकर उसकी आंखें भर आतीं. उसे महसूस होता कि उसके भीतर अब भी एक कलाकार सांस ले रहा है.शायद जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि कई बार इंसान जी तो रहा होता है, लेकिन अपने हिस्से की जिंदगी नहीं जी रहा होता.
उस लड़की ने एक बात बहुत गहराई से कही. जिंदगी हमेशा इंसान से उसकी पसंद नहीं पूछती. कई फैसले परिस्थितियां लेती हैं.
लेकिन सपनों को पूरी तरह खत्म करना किसी के बस में नहीं होता.और शायद यही उम्मीद की सबसे खूबसूरत बात है.क्योंकि जिन लोगों के सपने अधूरे रह जाते हैं, वही लोग एक दिन सबसे ज्यादा मजबूती से खड़े होते हैं. दर्द उन्हें तोड़ता जरूर है, लेकिन भीतर कहीं एक आग भी जला देता है.उसने भी खुद से एक वादा किया था .
चाहे जितनी देर लगे, लेकिन एक दिन मैं अपनी पहचान जरूर बनाऊंगी.
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जिजीविषा

कितना मर्मस्पर्शी और कितनी वास्तविकता से भरी बातें लिखी है आपने❣️साधुवाद
अत्यंत मार्मिकतापूर्ण अभिव्यक्ति 👍👌
ये सिर्फ़ एक लड़की की कहानी नहीं है बल्कि देश की आधी से अधिक आबादी की मार्मिक कहानी है। मनोविज्ञान यह कहता है कि पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों में सहनशक्ति धैर्य और सब्र कहीं ज्यादा होता है और यह बात साबित भी की जा चुकी है बहुत सारी स्टडीज में। यह धैर्य…यह पेशेंस ही है हम औरतों और लड़कियों का जो सपनों को मरने नहीं देती हैं।दिल के किसी कोने में अधूरे सपने हौले हौले श्वास लेते रहते हैं।बेहद यथार्थ सृजन
यथार्थ और मार्मिक बेहद संवेदनशील मैं रत्ना जी से पूर्णतया सहमत हूँ अपनी जिम्मेदारी के तले हम अपने सपने सहेज कर रख लेते हैं अधमरी सी सही किंतु वो सपने श्वास लेते ही रहते हैं .अनुपम लेखन 👌👌👏👏
रत्ना जी ने सही लिखा….।
लेखक की शानदार अभिव्यक्ति