
सपना परिहार, बिरलाग्राम नागदा जं.
माना तुम्हारी तरह वह आज की नहीं है,
पर वह उतनी भी पुरानी नहीं है।
तुम्हारे तौर-तरीके उसे समझ नहीं आते,
हर प्रलोभन उसे नहीं लुभाते।
कभी समय मिले तो उसे भी सुनना,
कुछ उसके, कुछ अपने किस्से कहना।
यक़ीन मानो, वह फिर से नई हो जाएगी,
कुछ पलों के लिए ही सही,
वह भी अपने बचपन में खो जाएगी।
तुमसे प्यार करने वाली माँ भी
किसी की दुलारी थी,
तुम्हारी तरह वह भी सबकी प्यारी थी।
पर आज वह तुम्हारे लिए जीती है,
तुम्हारे बोले हर कड़वे घूँट भी पीती है।
उसकी आँखों में भी देखो नमी,
माँ को भी सुनो कभी।
