
विजया डालमिया, हैदराबाद
जीवन सूना दिल भरा सा है
मंजिलों का फासला चला सा है।
रातरानी के फूल मुरझा गए सारे
खामोशी का आलम खिला सा है।
आहट सुनाई देती नहीं राह की
कदमों पर ताला लगा सा है।
मंजूर रवायतें होती नहीं सदा
रकीब बनके नसीब छला सा है।
मुझे भूली दास्तां बनाकर
गैरों के लिए वो बना भला सा है।
ख्वाहिशों के परिंदे हुए बेज़ुबान
ख्वाबों का दरख्त अभी ढला सा है।
टूट कर चाहने में कमी रह गई
नया अरमां कोई पला सा है।
खुद की अदालत में बेगुनाह हूँ
औरों को ये जुर्म खला सा है।
कासिद देखकर रोशन हुई आँखें
अर्श की फर्श पर चिराग जला सा है।
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