
रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर
अभी तक अपने पढ़ा-
गोलू तैयार हो आकर शेफाली से कहता है “मम्मी मैं रेडी हूं। पापा कब तक आयेंगे..? आप भी तैयार हो जाओ..”।गोलू की आवाज सुनकर शेफाली की तंद्रा भंग हुई..
अब गतांक से आगे….
“स्मार्ट लग रहे हो बेटा,पापा आते होंगे तुम बैठो मैं भी तैयार हो जाती हूं।”
इतने सालों बाद करण को होटेल में देख सकपका गई शेफाली। चेहरा घुमा ली अपना..नहीं चाहती थी की रोहन के सामने करण आए।
मेरी पत्नी शेफाली मेरे बॉस करण.. सुबह बताया था न..!
” अरे नहीं भाई दोस्त ही रहने दो.. नमस्कार शेफाली जी..!”
“जी नमस्कार” हाथ जोड़ लिया शेफाली ने
” बेटा नमस्ते करो अंकल को” गोलू को प्यार से रोहन ने कहा
“जोरों की भूख लगी है मुझे तो करण तुम बताओ क्या खाओगे ।”
“तू तो जानता है मेरा पसंद बदला थोड़ी न है कुछ भी ऑर्डर कर दे..।”
“पापा मेरे लिए चाउमिन “
” ओके,शेफाली तुम “
“तुमलोग जो खाओगे वही मैं भी…”
करण के सामने असहज थी शेफाली नज़रें नीची किए चुपचाप खाना क्या चूगती रही।
वहीं करण गोलू को देख कर अपना बचपन का चेहरा याद करके बहुत कुछ सोच रहा था।
रास्ते भर ढेर सारी बातें करण की बताता रहा रोहन ।
बिस्तर पर लेट तो गई शेफाली पर नींद गायब थी।
एक भय समा गया था अन्दर। हमेशा डरी डरी गुमशुम सी रहती की कहीं भेद न खुल जाय।
गोलू को अडॉप्ट करते समय सच जान गई थी।
रोहन को बताने से मना किया था उसने पालनागृह की मेनेजर को।
रोहन के ऑफिस जाने के बाद शेफाली अपनी मां को
फोन करती है…”सच तो जानती हूं पर आपके मुंह से सुनना चाहती हूं मां…” अपना कसम देकर बच्चे के बारे में सच सच बताने को बोलती है ।
सच सुनने के बाद शेफाली कहती है..”मां.!
जिस बच्चे को आपने मरा हुआ कहकर हमसे अलग कर दिया था न आज उसी बच्चे को ईश्वर ने मेरे पास भेज दिया है।जानती भी हो जिस बच्चे को हमने गोद लिया है वो मेरा बच्चा है। करण के जैसा ही दिखता है मां।
बस हमसे अब दूर रहिए कहकर फोन रख दी शेफाली।
आए दिन करण को खाने पर आमंत्रित करता रहता है रोहन। शेफाली के विरोध करने पर कहता..
“अरे यार दिक्कत क्या है बेचारा अकेला रहता है। कभी कभार खाना खिला दिया तो हर्ज क्या है। घर का खाना खाकर खुश हो जाता है।बहुत तारीफ़ करता है तुम्हारे हाथों बने खाने की।देखती हो न उंगलियां चाट चाट कर खाता है। तुम्हारी इज्ज़त भी करता है। कभी भी अव्यवहारिक नहीं होता है।बेफिजूल की बातें नहीं करता। बचपन से ही ऐसा है। गोलू को कितना प्यार करता है।”
“क्यूं घर में कोई नहीं है उसके..?”
“उसके पापा बचपन में ही गुजर गए थे, मां थी जो दो साल पहले चल बसी।शादी की नहीं महाशय ने,जानती हो क्यूं जिस लड़की से प्यार करते थे वो किसी और की हो गई । उसके आने का इंतजार तक नहीं की उस लड़की ने। कहता है कोई मजबूरी रही होगी उसकी।समझौता करने में बचपन से मास्टर है करण ।”
तभी..
“हां मजबूर ही तो थी” बेखयाली में कह गई शेफाली
“मेरा मतलब था होगी कोई मजबूरी।
छोड़ो न क्यूं उसकी बात लेकर अपनी रात क्यूं खराब करें।”
उधर करण सोच सोच कर परेशान था की गोलू मेरे जैसा दिखता है उसकी पसंद नापसंद बात करने का ढंग सब तो मिलता है मुझसे। कहीं गोलू मेरा ही बेटा तो नहीं..?
एक दिन खाने की जिद्द कर रहा था गोलू…
” मैं अचार रोटी ही खाऊंगा “
” जरुर खाओ बेटा मुझे भी अचार रोटी खाना बहुत पसंद है। शेफाली मैं भी आज यही खाऊंगा “
सब मूंह बाए करण को देख रहे थे। शेफाली को तो..जैसे सांप सूंघ गया। हाथ पांव ठंडे हो रहे थे उसके..!
“ओह सॉरी शेफाली जी…!वो क्या है न की अचार रोटी… रोहन तू तो जानता है “।
सोचते सोचते जाने कब सो गया करण।
पार्क में गोलू खेल रहा था और पेड़ के नीचे बैठी ख्यालों में गुम थी शेफाली।
तभी…
“पेड़ की छांव में आज़ भी बैठना पसंद है तुम्हे “
“ओह तुम..! ऑफिस नहीं गए…?”
“एक बात है जो परेशान कर रहा है। ज्यादा कुछ नहीं पूछूंगा सिर्फ़ ये जानना चाहता हूं कि गोलू मेरा बेटा है या..?”
“क्या करोगे जानकर कहीं..!”
“जो सोच रही हो वैसा कुछ नहीं होगा।
मैं इस बात से खुश हूं कि तुमने मेरे प्यार को जिंदा रखा।
बहुत बड़ी कंपनी में अफसर बनकर लाखो रुपए लेकर तुम्हारे पापा से मिलने गया था मैं।
मुझे नहीं पता और न ही जानना चाहता हूं किस मजबूरी में तुमने शादी की।
यदि मालूम होता की रोहन तुमसे शादी किया है तो यकिन मानो मैं कभी भी परेशान करने तुम्हारे घर नहीं आता।
गोलू को देखता हूं तो एक अजीब सा अहसास होता उसके प्रति खिंचाव महसूस करता था।
निश्चिंत रहो अब कभी तुम्हारी जिंदगी में दखल नहीं दूंगा।”
“एक बात पूछूं..?” “हूं”..
“शादी क्यूं नहीं की तुमने..?”
“प्यार बचा नहीं था दिल में,शादी करके देता क्या उसे..!”
“आगे क्या सोचा है..!”
“तुम्हारे प्यार में आधी जिंदगी निकल गई बाकी गोलू के मेरा है इस एहसास में बीत जायेगा इतना काफी है मेरे लिए..”।
” मुझे माफ़ कर दो कारण ।”
” तुम्हारी कोई गलती नहीं यही नियति थी ।”
कब से बादल उमड़ घुमड़ रहा था अचानक से नीला आसमान स्याह हो गया और बूंदें बरसने लगी।
“मम्मी छतरी खोलो” छतरी खोलते ही तेज़ हवा का झोंका उड़ा ले गया छतरी।
दोनों खिलखिला कर हंस पड़े। आज बरसों बाद हंसते देखा करण ने शेफाली को।
“क्यूं क्या हुआ कुछ याद आया..? शेफाली ने कहा
करण जवाब में सिर्फ़ मुस्कुरा दिया।
दिन बितता गया करण का आना कम होता चला गया। हर बार रोहन के कहने पर काम का बहाना कर कन्नी काट जाता।
बातों बातों में एक दिन सोच समझकर शेफाली रोहन को करण से दोस्ती की बात बता दी..!
रोहन खुले विचारों वाला था उसने कहा.. “हर किसी का एक अतीत होता है। तुम्हारे अतीत से मुझे कोई मतलब नहीं; न ही जानना चाहता हूं। ये अलग बात है की मैं कुछ अलग टाइप का इंसान हूं इस लिए मेरा कोई अतीत नहीं। पर जरूरी नहीं की हर कोई ऐसा हो।
बड़ा होकर जब गोलू का चेहरा बदला देखा तो मुझे करण याद आया। फिर सोचा एक चेहरे वाले सात लोग होते हैं।
उस दिन पार्क में तुम दोनों की बातें सुनी।
शक यकीन में बदल गया। मैं चाहता था तुम हमसे कहो। खैर…
वैसे करण बहुत ही अच्छा और समझदार,मेहनती है बचपन से। हमदोनो एक ही मोहल्ले में रहते थे। मेरे डैडी काफ़ी मदद किए थे उसकी पढ़ाई में हमेशा अव्वल आता था।
परवरिश में उसकी मां गरीबी को कभी आड़े नहीं आने दी। तभी तो वो मेरा घनिष्ट मित्र बना।
खैर…
डोंट वरी हमारे प्यार में कभी कोई कमी नहीं आयेगा वो जैसा था वैसा ही रहेगा।”
उसके माथे को चूमकर अपनी बाहों में भर कर सो गया रोहन।
भयंकर तूफानी रात आज बाहर थी।अंतस का तूफान शांत हो चुका था।
धरासार बारिश बाहर हो रही थी और शेफाली के ह्रदय शीतल कर रही थी। कोर से ढूलक आए खुशी के आंसू को तकिए पर गिरने से पहले ही मुस्कुराकर हथेलियों से पोंछ लिया।
कितने समय बाद आज संतुष्टि की लंबी सांस अंदर भरकर रोहन के सीने में मुंह घुसाकर निश्चिंत हो सो गई शेफाली।
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अब क्या होगा -3
लेखिका के बारे में-
रीता मिश्रा तिवारी
हिंदी साहित्य जगत की एक सशक्त और संवेदनशील रचनाकार हैं, जिनका जन्म 12 दिसंबर 1967 को बिहार के भागलपुर में हुआ। शिक्षिका के रूप में दीर्घकालीन सेवा के पश्चात आज वे सेवा निवृत्त होकर पूर्णतः साहित्य सृजन में समर्पित हैं। एम.ए. एवं बी.एड. शिक्षित रीता जी ने ज्ञान और संस्कारों का दीप जलाते हुए समाज में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। कविता, कहानी, लघुकथा, हाइकु, संस्मरण और आलेख जैसी विविध विधाओं में उनकी लेखनी समान रूप से सशक्त और प्रभावशाली है। उनकी रचनाओं में जीवन की संवेदनाएँ, समाज की सच्चाइयाँ और मानवीय भावनाओं की गहराई स्पष्ट झलकती है। आकाशवाणी भागलपुर से उनके काव्य एवं कथा पाठ का नियमित प्रसारण उनकी साहित्यिक सक्रियता का प्रमाण है। उनकी प्रमुख कृतियों में “अविता” (एकल कहानी संग्रह) और “प्रेम लौटता है” (एकल काव्य संग्रह) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त वे अनेक प्रतिष्ठित साझा काव्य एवं कहानी संकलनों का हिस्सा रही हैं। देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं और ई-पत्रिकाओं में उनकी 300 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित होकर पाठकों के बीच सराही जा चुकी हैं। रीता मिश्रा तिवारी के लिए साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का सजीव दर्पण है, जिसमें जीवन के अनछुए पल, अनुभव और यथार्थ सजीव हो उठते हैं। उनकी लेखनी न केवल विचारों को झकझोरती है, बल्कि पाठकों के हृदय को भी गहराई से स्पर्श करती है।

Thank you so much Suresh Ji 🌹