
संगीता हड़के, भोपाल
मैं ही उजाला, मैं ही अँधेरा हूँ,
मैं ही ख़ुशी, मैं ही दुःख हूँ।
मैं ही समंदर, मैं ही सुखद नदिया हूँ,
मैं पंछी, मैं ही पिंजरा हूँ।
अकेलापन भी मेरा, चहचहाहट भी मेरी,
जब सब कुछ मेरा है, तो क्यों कुछ और चाहिए?
मैं अपनी हूँ, और इसी बात पर इतराती हूँ,
चाहे घमंड कह लो, या अहंकार।
चाहे जैसी भी हूँ मैं,
साथ बहुत सुकून-सी हूँ मैं।
मैं अपनी कविता, अपनी ग़ज़ल हूँ,
आज दिल चाहा, तो लिख दिया
मेरे शब्द मेरे अपने ही तो हैं।
