
डॉ. अनामिका दुबे “निधि” मुंबई
मेरे नयन तरस गए भगवन, वीर योद्धा देखन को,
वीरांगनाएँ भी लुप्त हो रहीं, माँ भारत की धरती से।
कहाँ गए वो रण के धीरज, त्याग-तपस्या वाले वीर,
जिनकी गाथाएँ गूँज उठें तो, काँपे अन्यायी अधीर।
ब्रह्मा जी संग नारायण और महादेव की जब भेंट हुई,
चर्चा का गंभीर विषय बन, रोती धरती की रीत हुई।
सहस्र चिट्ठियाँ दर्द भरी, लेकर वो दरबार में आई,
कातर स्वर में विनती करती, अपनी पीड़ा सबको सुनाई।
बोली – “प्रभु! समझो मेरी दशा, कैसा ये अजब ज़माना,
चलन नया जो चल पड़ा है, मुझको बिल्कुल न भाना।
एक बीमारी बनकर जैसे, सोशल मीडिया छाया है,
मानव अपने मूल स्वभाव से, जाने कहाँ पराया है।
रीलों पर नाचे बिटिया, माता भी साथ निभाती है,
पिता अनुशासन भूल गए, खुद वीडियो बनाते हैं।
लाइक-कमेंट की चाहत में, रोज़ तमाशा होता है,
सच्चे रिश्तों का दीप बुझा, दिखावे का राग होता है।
मेरी इतनी प्यास प्रभु है, जीजामाता फिर से आएँ,
वैसी ममता, वैसी शिक्षा, फिर से घर-घर में छाएँ।
उसी लगन और सद्भाव से, वीर शिवाजी जन्म लें,
धर्म, शौर्य और मर्यादा के, दीप पुनः जगमग करें।
मेरे नयन तरस गए भगवन, वीर योद्धा देखन को,
वीरांगनाएँ भी लुप्त हो रहीं, माँ भारत की धरती से।
नारी जो दुर्गा कहलाती, अब खुद से ही डरती है,
संस्कारों की छाँव न पाकर, राह भटकती फिरती है।
कहाँ गई वो रानी लक्ष्मीबाई, सिंहनी सी गर्जना करती,
रणभूमि में शत्रु देखकर, बिजली बनकर जो गिरती।
कहाँ गए वो बलिदानी, हँसते-हँसते शीश झुकाने वाले,
मातृभूमि की रक्षा में, प्राणों की आहुति देने वाले।
धरती फिर करुणा से बोली – “प्रभु! ये कैसा दौर आया,
शौर्य, धर्म और मर्यादा का, दीपक क्यों मंद पड़ाया?”
नारायण बोले शांत स्वर में –
“धैर्य धरो हे धरती माता, समय चक्र चलता रहता,
जब-जब मानव भटके पथ से, संतुलन फिर लौट ही आता।
अज्ञान के इस घने तम में, ज्ञान दीप फिर जलता है,
हर अंधेरी रात के बाद, सूरज भी तो निकलता है।”
ब्रह्मा जी ने कहा –
“सृष्टि नियम से चलती है, यह शाश्वत सत्य पुराना,
जैसा बीज मनुष्य बोए, वैसा ही फल पाना।
यदि स्वर्णिम युग फिर चाहो, पहले खुद को बदलना होगा,
संस्कारों की गंगा बहा, अंधकार को हरना होगा।”
तब महादेव ने त्रिनेत्र खोला, गूँजा डमरू का नाद,
“जागो मानव! समय यही है, छोड़ो झूठा हर संवाद।
मिथ्या दिखावे से हटकर, सत्य का मार्ग अपनाओ,
धरती माँ की पीड़ा समझो, जीवन सफल बनाओ।
रक्त में जो ज्वाला सोई, उसको फिर से जगाओ,
वीरता केवल कथा नहीं, उसको जीवन में लाओ।
हर बालक में छिपा शिवाजी, हर नारी में झाँसी रानी,
जगाओ उस चेतना को, फिर बदलेगी ये कहानी।”
नारी तुम शक्ति स्वरूपा हो, अपने स्वरूप को पहचानो,
भीतर छिपी उस अग्नि को, फिर से प्रज्वलित कर जानो।
संस्कारों की छाया में, फिर से पीढ़ी को ढालो,
भारत माँ के गौरव को, अपने कर्मों से संभालो।
धरती ने तब शीश नवाया, आशा की किरण मुस्काई,
“यदि सुधरे मानव का मन तो, फिर खुशहाली आएगी भाई।
जीजामाता की ममता फिर, हर घर आँगन महकाएगी,
वीर शिवाजी जैसे सपूत, फिर धरती पर जन्मेंगे भाई।”
आओ मिलकर प्रण ये लें, हम खुद को पहले बदलेंगे,
सत्य, धर्म और वीरता के, दीप हृदय में जलाएँगे।
तभी तो ये पावन धरती, फिर से स्वर्ग बन पाएगी,
और भारत माँ की गोदी में, वीरों की फसल लहराएगी।
