टूटते रिश्ते, बढ़ती हिंसा

एक कमरे में अलग-अलग बैठे तनावग्रस्त दंपत्ति, टूटा हुआ रिश्ता और मानसिक दबाव दर्शाता भावनात्मक दृश्य

डॉ.गरिमा भाटी, हरियाणा

आज के समय में रिश्तों के भीतर पनपती हिंसा किसी एक घटना की सनसनी नहीं, बल्कि हमारे समाज के भीतर गहरे बैठे असंतुलन की लगातार बजती चेतावनी है। अख़बारों के पन्ने अब सिर्फ खबरें नहीं छापते, वे हमारे सामाजिक संस्कारों का आईना भी बनते जा रहे हैं

जहां कभी पत्नी द्वारा पति की हत्या, तो कभी पति द्वारा पत्नी की हत्या की खबरें सामान्य-सी प्रतीत होने लगी हैं। हाल ही में एक घटना ने भीतर तक झकझोर दिया, जहां पत्नी पर शक के चलते एक पिता ने अपनी ही दो मासूम जुड़वा बेटियों की जान ले ली। यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि उस सोच का परिणाम है, जिसे हमने वर्षों से अपने समाज में पनपने दिया है। अक्सर ऐसे मामलों में बहस दो ध्रुवों पर जाकर अटक जाती है।क्या इसके लिए पुरुषवादी मानसिकता जिम्मेदार है या स्त्रीवादी सोच? परंतु यह प्रश्न जितना सरल दिखता है, उतना है नहीं।

असल सवाल यह है कि क्या हमने अपने समाज में स्त्री और पुरुष,दोनों को यह सिखाया है कि जब कोई रिश्ता बोझ बन जाए, जब उसमें सम्मान और विश्वास की जगह संदेह और घुटन ले ले, तब उस स्थिति से बाहर निकलना भी एक विकल्प है? क्या हमने यह सिखाया है कि मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस है? हमारा समाज बचपन से ही भावनाओं को सीमाओं में बांध देता है। लड़कों को सिखाया जाता है-“मर्द रोते नहीं”, “कमजोरी दिखाना शर्म की बात है”, “घर की इज्जत तुम्हारे हाथ में है”, और “पत्नी पर नियंत्रण बनाए रखना तुम्हारा अधिकार है।” वहीं लड़कियों को यह समझाया जाता है कि “रिश्ते हर हाल में निभाने होते हैं”, “समझौता ही स्त्री का आभूषण है”, और “घर टूटना उसकी असफलता है।” ये शिक्षाएं धीरे-धीरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं और व्यक्ति को ऐसे रिश्तों में बांध देती हैं, जहां प्रेम की जगह केवल जिम्मेदारियां और भय रह जाते हैं।
जब किसी रिश्ते में दरार आती है, तो उसे स्वीकार करना हमारे लिए सबसे कठिन हो जाता है।

एक पक्ष यदि उस रिश्ते से बाहर निकलना चाहता है, तो दूसरा पक्ष उसे रोकने की हर संभव कोशिश करता है,कभी भावनात्मक दबाव के जरिए, कभी सामाजिक बदनामी के डर से, और कभी कानूनी उलझनों के कारण। और यदि किसी तरह वह रिश्ता टूट भी जाए, तो समाज के ताने, परिवार की नाराज़गी और भविष्य की अनिश्चितता व्यक्ति को भीतर तक तोड़ देती है। इस पूरी प्रक्रिया में व्यक्ति अकेला पड़ जाता है, उसकी मानसिक स्थिति डगमगाने लगती है, और वह धीरे-धीरे अवसाद, तनाव और आक्रोश के जाल में फंसता चला जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति रोज़-रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरता है। वह अपने भीतर की पीड़ा को व्यक्त नहीं कर पाता, क्योंकि उसे डर होता है कि उसे कमजोर समझा जाएगा।

वह मदद नहीं मांगता, क्योंकि उसे सिखाया गया है कि समस्याओं का सामना अकेले करना ही उसकी जिम्मेदारी है। और जब यह दबाव एक सीमा पार कर जाता है, तब वही व्यक्ति या तो आत्मघाती कदम उठा लेता है, या फिर अपने आसपास के लोगों पर हिंसा के रूप में फूट पड़ता है। यह हिंसा अचानक नहीं होती, बल्कि वर्षों से जमा हो रही पीड़ा और असंतोष का विस्फोट होती है।
हमें यह समझना होगा कि हर अपराध के पीछे केवल एक व्यक्ति का दोष नहीं होता, बल्कि वह हमारे सामाजिक ढांचे की विफलता का परिणाम होता है। यदि हम सच में ऐसे अपराधों को रोकना चाहते हैं, तो हमें अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। हमें अपने बच्चों-चाहे वे लड़के हों या लड़कियां,दोनों को यह सिखाना होगा कि भावनाएं व्यक्त करना जरूरी है, मदद लेना आवश्यक है, और किसी भी रिश्ते में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ आत्मसम्मान और मानसिक शांति है।
हमें यह स्वीकार करना सीखना होगा कि हर रिश्ता जीवन भर निभाने के लिए नहीं बना होता। कुछ रिश्ते समय के साथ खत्म हो जाते हैं, और उन्हें खत्म होने देना ही सबसे बेहतर विकल्प होता है। एक खोखले, दम घोंटते रिश्ते में जीवन भर कैद रहना न केवल व्यक्ति को मानसिक रूप से तोड़ता है, बल्कि समाज में ऐसी घटनाओं की जमीन भी तैयार करता है।

इसलिए जरूरत इस बात की है कि हम रिश्तों के टूटने को असफलता नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत के रूप में देखना सीखें। हमें ऐसे सामाजिक और कानूनी ढांचे तैयार करने होंगे, जहां अलग होना एक सम्मानजनक और सहज प्रक्रिया हो, न कि एक संघर्षपूर्ण युद्ध। क्योंकि अंततः, एक अस्वस्थ रिश्ते में जीते हुए हर दिन मरने से बेहतर है हिम्मत के साथ उसे अलविदा कहना और एक नई, स्वस्थ जिंदगी की ओर कदम बढ़ाना।

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