कुर्सी का किस्सा: यादों में बसती एक परंपरा

महिदपुर रोड के बाजार में दुकान के बाहर रखी पारंपरिक कुर्सी का दृश्य

जब एक साधारण कुर्सी बताती थी दुकान की पहली कमाई की कहानी

सुरेश परिहार संपादक, पुणे

महिदपुर रोड का बाजार… आज भी जब वहां से गुजरता हूं, तो दुकानों के बाहर रखी वे कुर्सियां मुझे बरबस अपनी ओर खींच लेती हैं। भीड़-भाड़, चमक-दमक और आधुनिकता के बीच खड़ी वह एक साधारण सी कुर्सी जैसे बीते समय की कहानी कहने लगती है।

बचपन में समझ नहीं आता था कि जब दुकान के अंदर इतनी जगह है, तो बाहर यह कुर्सी क्यों रखी जाती है। कई बार मन में सवाल उठता क्या यह सिर्फ बैठने के लिए है या इसके पीछे कोई और रहस्य छुपा है? समय के साथ जब बड़ों से सुना, समझा, तो एहसास हुआ कि यह कुर्सी महज एक फर्नीचर नहीं, बल्कि पूरे बाजार की संस्कृति का हिस्सा थी।

वह दौर कुछ और ही था। महिदपुर रोड पर दुकानें कम थीं, लेकिन हर दुकान अपने आप में एक पूरा बाजार थी। लक्ष्मीनारायण सेठ की दुकान हो या गणेशालाल जी धमोनिया की, ढलाराम-काशीराम पंजाबी हों या प्रीतमलाल-चुन्नीलाल—इन दुकानों में जीवन के हर पड़ाव की जरूरतें मिल जाया करती थीं। जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी संस्कारों का सामान, एक ही छत के नीचे।

और सबसे खास बात तब व्यापार में प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि अपनापन था। अगर किसी दुकान पर कोई चीज नहीं मिलती, तो दुकानदार खुद बता देता था “भाई, यह चीज सामने वाली दुकान पर मिल जाएगी।” आज के दौर में यह बात सुनने को मिल जाए, तो मानो चमत्कार ही हो जाए।

इन्हीं दिनों की एक खास पहचान थी दुकान के बाहर रखी वह कुर्सी।

सुबह-सुबह जब दुकान खुलती, तो सेठजी बाहर एक कुर्सी रख देते। यह कुर्सी किसी के बैठने के लिए नहीं, बल्कि एक संकेत थी कि दुकान खुल गई है, लेकिन अभी ‘बोनी’ नहीं हुई है। ग्राहक भी इस इशारे को समझता था। वह ज्यादा मोलभाव या बातचीत में समय न गंवाते हुए जल्दी से सामान ले लेता, ताकि सेठजी की बोनी हो जाए। और जैसे ही दिन की पहली बिक्री होती, वह कुर्सी चुपचाप अंदर चली जाती। बिना कुछ कहे, एक संदेश दे जाती “आज की शुरुआत हो चुकी है।”

यह सिर्फ एक दुकान की बात नहीं थी, बल्कि पूरे बाजार की अनकही भाषा थी। एक तरह से यह कुर्सी दुकानदारों के बीच भी आपसी समझ का माध्यम थी कि अब ग्राहक दूसरे दुकानदारों के पास भी जा सकते हैं, ताकि उनकी भी बोनी हो सके।

समय बदला, बाजार बदले, और यह परंपरा भी धीरे-धीरे पीछे छूट गई। लेकिन कुर्सी आज भी वहीं है बस उसका मतलब बदल गया है।अब यह कुर्सी खास मेहमानों के लिए होती है। सम्मान की कुर्सी। हर किसी को इस पर बैठने का अधिकार नहीं होता। इसमें बैठने के भी अपने उसूल हैं शालीनता, संयम और व्यवहार की मर्यादा। गाली-गलौज या ऊंची आवाज में बात करने वाले के लिए यह कुर्सी नहीं है।

मुझे याद है शंकर सेठ की दुकान पर यह कुर्सी मेरे पिताजी के लिए होती थी। सौभाग्य मेडिकल स्टोर पर डॉ. जितेंद्र वर्मा और हिम्मतसिंहजी खिंची सर के लिए, और बापूलाल जी मावावाले के यहां महादेव दादा के लिए। यह सिर्फ बैठने की जगह नहीं, बल्कि सम्मान का प्रतीक थी। शाम के समय जब सेठजी इस कुर्सी पर बैठते, तो समझ में आ जाता अब वे फुर्सत में हैं। उस समय उनकी आवाज में तकाजा नहीं, बल्कि अपनापन होता था। गद्दी से आवाज लगाने और इस कुर्सी से पुकारने में फर्क होता था एक में हिसाब-किताब, तो दूसरे में हंसी-मजाक और सुकून।आज जब उस बाजार से गुजरता हूं, तो लगता है समय भले ही बदल गया हो, लेकिन कुछ चीजें आज भी हमें हमारी जड़ों से जोड़े रखती हैं। वह कुर्सी भी उन्हीं में से एक है।

3 thoughts on “कुर्सी का किस्सा: यादों में बसती एक परंपरा

  1. कुर्सी का किस्सा अभी अभी पढ़ा।संस्मरण पढ़ने का मजा ही तब मिलता है जब लेखक की अंगुली थामे पाठक उसके अतीत से उसी अपनेपन के साथ गुजरता चला जाए जिस अपनेपन के सुखद स्पर्श को लेखक जीता है।बहुत बहुत बहुत शानदार लेखन ।लेखक आदरणीय सुरेश सर के बारीक निरीक्षण की भी मैं मुरीद हूं।

    1. रत्नाजी,
      आपकी टिप्पणी के लिए दिल से धन्यवाद. आपके शब्द मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं. सच कहूं तो मैं आप जैसा कोई बड़ा लेखक या साहित्यकार नहीं हूं, बस जो महसूस करता हूं वही सरल शब्दों में लिख देता हूं. मेरे लिखे में में चमक नहीं होती है लेकिन उसमें दिल की सच्चाई जरूर होती है.आपको मेरी सीधी-सादी भाषा पसंद आई, यही मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है. आपका यह स्नेह और प्रोत्साहन ही मुझे और बेहतर लिखने की प्रेरणा देता रहेगा.आपका स्नेह ऐसे ही बना रहे, यही उम्मीद है. एक बार फिर दिल से धन्यवाद.

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