
अर्पणासिंह अर्पी, प्रसिद्ध कवयित्री, रांची
नवरात्रि शब्द “नव” और “रात्रि” को मिलाकर बना है। नवरात्रि माँ के अलग-अलग रूपों को निहारने, सजाने और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने की अवधि है। हिन्दू धर्म में इसका बहुत बड़ा महत्व है। ऐसी मान्यता है कि माँ नवरात्र में नौ दिनों के लिए धरती पर (अपने मायके) आती हैं।वैसे तो साल में चार नवरात्र होते हैं, परन्तु शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि का महत्व अधिक माना जाता है। इनमें से दो नवरात्रि गुप्त होते हैं। इन सब में भी चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्व है।
ऐसी मान्यता है कि चैत्र नवरात्र के बाद सूर्य का राशि परिवर्तन होता है। यह बसन्त ऋतु के आरंभ के साथ आता है, जो उत्साह, ऊर्जा और नवीनता का संचार करता है। इसका प्रारम्भ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होता है, जो नौ दिनों तक चलता है। इन दिनों में भक्त ध्यान, भक्ति और साधना के माध्यम से अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं।चैत्र नवरात्र आध्यात्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिन्दू समाज इसे एक उत्सव के रूप में मनाता है और पूजा, अर्चना एवं साधना के माध्यम से स्वयं को पुनर्जीवित करता है।
इन नौ दिनों में साधक और भक्त अपने तन, मन और धन से माँ की पूजा-अर्चना करते हैं तथा परिवार, समाज और स्वास्थ्य के कल्याण के लिए आराधना करते हैं। विश्व कल्याण के लिए माँ की स्तुति, भजन तथा वातावरण की शुद्धि हेतु हवन भी किया जाता है। माँ को फल-मिठाई का भोग लगाते हुए विशेष फल प्राप्ति के लिए प्रतिदिन अलग-अलग नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
विशेष फल प्राप्ति हेतु प्रतिदिन नैवेद्य अर्पण
- प्रतिपदा – घृत (गाय का घी)
- द्वितीया – शक्कर
- तृतीया – दूध
- चतुर्थी – मालपुआ
- पंचमी – केला
- षष्ठी – मधु (शहद)
- सप्तमी – गुड़
- अष्टमी – नारियल
- नवमी – धान का लावा
इन नैवेद्यों के अर्पण से भक्त आरोग्य, आयुष्य, दुख-विघ्नों से मुक्ति, बुद्धि-विकास, रूप-सौंदर्य, संताप नाश एवं सर्वसुख की प्राप्ति की कामना करते हैं। नवमी के दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। श्री राम के रूप में भगवान विष्णु मानव अवतार लेकर धरती पर आए थे। इस कारण भी हिन्दू धर्म में चैत्र नवरात्र का अत्यंत महत्व है। माँ धरती पर आकर सबके जीवन में ऊर्जा, उत्साह और प्रेम का संचार करती हैं तथा सभी की मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं।
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