नज़रिया हमारा किसी भी वस्तु प्राणि या व्यक्ति के प्रति दृष्टिकोण. यानि हमारा दृष्टिकोण उसके प्रति यदि साफ स्वच्छ या सकारात्मक है तो वह उस व्यक्ति वस्तु या प्राणि को ईश्वर बना देगा और यदि ईर्ष्या द्वेष और नकारात्मक भावों से भरा है तो शायद हम भगवान को भी न बख्शेंगे अन्य किसी की तो बिसात ही क्या ..! किसी के भी प्रति दुनिया भर की कमियां और बुराइयों से हमारा मन मस्तिष्क भर जाता है.
कहने का तात्पर्य यह है कि हमें अपने स्वयं के दृष्टिकोण के प्रति सजग निश्छल एवं सरल सकारात्मक रहने की आवश्यकता है. तभी हम सभी के साथ तारतम्यता स्थापित कर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर पाएंगे अन्यथा, कमियां निकालकर जीने के लिए जीवन कम पड़ जाते हैं और हम अपने दृष्टिकोण के साथ अकेले खड़े रह जाते हैं.
क्योंकि किसी भी व्यक्ति वस्तु या प्राणि के प्रति गलत दृष्टिकोण तनाव आक्रोश कुंठा एवं अराजकता को जन्म देता है जहां उसके समस्त विकास अवरूद्ध होकर रह जाते हैं. दोस्तों इस नज़रिये को दर्शाती उदाहरण स्वरूप एक लघुकथा आप सभी के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही हूं. आशा करती हूं कि आप समस्त हित मित्रों की सहमति अवश्य मिलेगी .
एक युवा दम्पत्ति किसी दुसरे शहर से ट्रांसफर होकर नए घर में रहने आए . दोनों ही पति – पत्नी अपने नए घर में, गृहस्थी जमाने की कोशिश में पूरा दिन लगे रहते. जब, सामान व्यवस्थित करने के बाद कुछ देर की फुर्सत मिलती तो दोनों, घर की बालकनी में एक साथ बैठकर चाय पीते.दो चार दिन निकल गए एक दिन पत्नी ने अपने सामने के घर में सूखते हुए कपड़े देखकर कहा ङ्गङ्घ सुनिए जी! देखिए तो जरा ! सामने जो भी परिवार उस घर में रहता है, इन्होंने जो कपड़े धोकर सुखा रखें हैं वे कितने गन्दे है . इन्हें ठीक से कपड़े धोना भी नहीं आता या फिर इनका डिटर्जेन्ट सही नहीं है. पति ने उसकी बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.
अगले दिन जब फिर चाय पीते समय वही वात पत्नी ने फिर से दोहराई .पति ने उसकी बात फिर से अनसुनी कर दी.
कई दिनों तक पत्नी पड़ोसियों के कपड़े साफ न धोएं जाने का अ़फसोस जताती रही . एक दिन रविवार को जब दोनों फुर्सत से बालकनी में चाय पीने बैठे तो, पत्नी ने देखा कि पड़ोसियों के कपड़े बड़े स़ाफ सुथरे और चमकदार नजर आ रहे हैं.वह व्यंग्यमय अंदाज बोली ङ्गङ्घ देखिए जी ! शायद हमारे पड़ोसियों को अब सही से कपड़े धोने आ गए हैं या फिर इन्होंने अपना डिटर्जेन्ट बदल लिया है . पति जो इतने दिनों से चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था बोला- पड़ोसियों के कपड़े जो तुम्हें इतने दिनों से मैले नजर आ रहे थे ,उसमें न तो उनका दोष था न उनके डिटर्जेन्ट का बल्कि तुम्हारी नज़रों का दोष था. जिस खिड़की से तुम पड़ोसियों की बालकनी में उनके कपड़ों को देखकर कमी निकालती आ रही हो, उसके शीशे वास्तव में इतने गन्दे थे कि, कोई भी वस्तु गन्दी ही नज़र आएगी , किन्तु हम अन्य कार्यों में इतने व्यस्त रहते हैं कि इस ओर ध्यान ही नहीं देते कि ,वास्तव में कमी कहां है. उस वस्तु या व्यक्ति में या हम जिस दृष्टिकोण से उसे देखते हैं उसमें यह सुनकर पत्नी बहुत शर्मिन्दा हुई और उसे अपने उस व्यवहार के प्रति भविष्य में बिना सोचे समझे किसी के भी प्रति गलत धारणा या नकारात्मक भावों से दूर रहने हेतु स्वयं को वचनबद्ध किया.
दोस्तों बिना वास्तविकता जानें किसी के भी प्रति गलत धारणा बना लेना या ग़लत निर्णय लेना सही नहीं है.यह मनुष्य को केवल पतन की ओर लेकर जाता है. क्योंकि जिस दृष्टिकोण को अपनाकर वह यह कार्य करता है वह केवल उसका अकेले का होता . इसीलिए अपने नज़रिए को सकारात्मक बनाएं यही जीवन का मूल मंत्र है.

-सीमा शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, नोएडा, उत्तरप्रदेश

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