एक सफ़र ऐसा भी….

ट्रेन में मिली उस नीली आँखों वाली उदास महिला ने जाते-जाते एक सवाल छोड़ दिया “क्या ब्याहतों के पर काट दिए जाते हैं?” उसकी मुस्कान कुछ पल की थी, बस उतनी देर जितनी देर कोई सावन अपनी बरसात रोक कर खिड़की से झाँकता है। वह स्टेशन पर उतर गई, और मैं सोचता रह गया . कितनी स्त्रियाँ अपनी आँखों में बरसात को कैद करके जी रही हैं, जैसे उन्हें कभी बरसना ही न हो।

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ग़ज़ल

दिल-ए-नादाँ को रुसवा क्यों करें हम,ज़माने से यूँ शिकवा क्यों करें हम। हमारे दर्द को समझे नहीं वो,तो अपने मन को मैला क्यों करें हम। उन्हें बेपर्दगी का पास है जब,भला फिर उनसे पर्दा क्यों करें हम। जिसे परवाह उलफ़त की नहीं अब,उसी पर वक़्त ज़ाया क्यों करें हम। मुहब्बत कर ली क्या, आफ़त बुला…

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इश्क़ और जुदाई

ज़िंदगी अब बेबस-सी हो गई है, मानो किसी अपने को खो देने के बाद उसका सहारा ही छिन गया हो। आँखों में आँसू हैं, जिन्हें नजरों में छुपाकर रखा गया है। तालीम और सीख की राह इतनी आसान नहीं होती, क्योंकि उस्ताद को नादान बनाकर कभी सीखा नहीं जा सकता।
अहसान का कर्ज़ कभी अदा नहीं हो सकता, और फिर भी लोग फर्ज़ भूलकर अहसान को भी भुला देते हैं। जब यादों की धूप छूने लगती है तो उदासी का साया पास बैठ जाता है।इश्क़ कोई बाज़ी नहीं, बल्कि दिल का अफसाना है। इसे जीतने के लिए चुराना पड़े तो उसमें मज़ा नहीं रह जाता। नादान दिल इश्क़ में डूब चुका है, आँसुओं के सैलाब में बरबाद हो गया है।

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तेरी यादों का शहर

यह दिल तेरी यादों से पीछा नहीं छुड़ा पाता, जैसे हर गली, हर मोड़ पर वही पुराना चेहरा इंतज़ार में खड़ा हो। दिल इतना सख़्त है कि आँसू तक नहीं निकलते, और तेरे मोहल्ले से दूर होकर भी जीने का ख्याल अधूरा लगता है, क्योंकि मेरे दिल का शहर कहीं और बसता ही नहीं। तेरी यादों की गलियों में भटकते हुए सोचता हूँ—इन तमाम यादों में कभी मेरा भी नाम क्यों नहीं आता।

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आजन्म बिछोह

इस बार की यात्रा वैसी नहीं थी जैसी पहले हुआ करती थी। न तस्वीरें देखीं, न डायरी लिखी — मन एक अजीब उचाट, थका और शून्य में डूबा हुआ है। जूड़े के फूलों के बीच अब एक जोड़ी उदास आँखें महसूस होती हैं, जो स्मृतियों की तरह टंगी रह गई हैं। हर बार की तरह यह यात्रा आनंद नहीं, बल्कि एक सैलाब छोड़ गई — भावनाओं का, बिछोह का, और उस प्रेम का जो चुपचाप आता है और सब बहा ले जाता है। इस बार आषाढ़ केवल मौसम नहीं, एक डूबती आत्मा का रूप बन गया है। न प्रतीक्षा है, न वचन, न कोई सहारा — बस एक अंतहीन दूरी, जहाँ अगली मुलाकात की कोई संभावना नहीं। इस प्रेम की परिणति नहीं, केवल आजन्म बिछोह ही लिखा है।

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अंदर की चीख़ें: मुस्कुराते चेहरे के पीछे का तूफ़ान

यह कविता एक ऐसी संवेदनशील आत्मा की आवाज़ है जो दुनियावी दिखावे और भीड़ की नजरों से छुपे अपने दर्द, संघर्ष और अंतर्मन की झंझावतों को बयां करती है। वह खुद को रोज़ झुकाते हुए भी टूटी नहीं है, अपने अंदर के तूफ़ान से रोज़ लड़ती है, लेकिन उसकी चुप्पी, उसका हौसला, उसकी मोहब्बत और उसकी संभावनाएं—किसी की नज़र में नहीं आतीं। यह एक ऐसा आईना है जिसमें हर वो व्यक्ति खुद को देख सकता है जिसने कभी खुद को भीड़ में खोया पाया हो।

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