हिंसा और अहिंसा

हिंसा और अहिंसा केवल शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य की सोच और कर्म की दिशा हैं। कोई शरीर को मारता है, कोई मन को—और दोनों ही पीड़ा छोड़ जाते हैं। जो तड़पते को देखकर भी अकड़ जाए, वही सच्ची हिंसा है; और जो बिना कहे दुख हर ले, वही अहिंसा। जीवन की असली परीक्षा वहीं है, जहाँ करुणा सवाल बनकर खड़ी हो जाती है।

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नया साल

यह रचना सालों के बदलने के बहाने मनुष्य की आदतों, हिंसा और संवेदनहीनता पर तीखा व्यंग्य है। 2025 और 2026 के संवाद के माध्यम से कवि यह प्रश्न उठाता है कि क्या नया साल सच में नया होता है, या वही पुरानी शरारतें नए कैलेंडर के साथ आगे बढ़ जाती हैं।

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हम गज़ल कहने लगे…

जब से लोग खून-खराबे को भी उत्सव का नाम देने लगे, तभी से पुराने घाव फिर से हरे होने लगे। शहर इतना खामोश हो गया है कि हादसों की आवाज़ भी नहीं उठती, क्योंकि यहाँ खुशनुमा चेहरों के बीच कलमें झुककर रह गई हैं। घुँघरुओं का दर्द अब नया नहीं लगता, क्योंकि बारूद से सजे कारवाँ चलने लगे हैं। इशारों की भाषा भी लोगों को समझ नहीं आती, दोस्ती के हाथ बेवजह कटने लगे हैं। सहमी हुई फिज़ाओं में रात भी ढलती नहीं, क्योंकि मोहब्बत के दिए तूफ़ानों से लड़ने लगे हैं। और यही कारण है कि ‘राकेश’ अब सियाह रातों में सर नहीं उठाता क्योंकि जंगें हारने के बाद लोग ग़ज़लें कहने पर मजबूर हो जाते हैं

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आजादी का कृष्णपक्ष

आजादी का कृष्णपक्ष**” में कवि स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की उमंग और उल्लास का चित्रण करते हुए हमें याद दिलाता है कि यह आजादी सहज या मुफ्त में नहीं मिली थी। नीति-कुशलता और योजनाओं के बल पर विदेशी शक्तियों ने भारत में अपने पैर जमाए और “सोने की चिड़िया” के घर में लूटपाट मचाई। फूट डालकर शासन करने की नीति ने धर्मों पर संकट और आपसी विभाजन की आग फैलाई।आजादी के स्वप्न देखने वाले वीरों ने प्राणों की आहुति दी, परंतु उन्हें यह आभास भी नहीं था कि स्वतंत्रता के साथ ही देश को बंटवारे का फरमान मिलेगा। इस उपलब्धि में असंख्य जवानियों की कुर्बानी और बंटवारे में छुपी अनेक अनसुनी कहानियाँ शामिल हैं, जिनमें दुख, करुणा, आतंक और दर्द की गहरी परतें छिपी हैं। विभाजन और विस्थापन के दौरान साथ निभाने वालों ने ही घर-द्वार लूट लिए, मानवता पर पशुता हावी हो गई, हिंसा ने अहिंसा को ढक लिया। कवि आने वाली पीढ़ियों को यह सच्चाई बताने का आग्रह करता है कि भारत नफरत और हिंसा की आड़ में खंडित हुआ।

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