जिंदगी का सच
हार और जीत, सुख और दुख, प्रेम और घृणा—जिंदगी इन सभी भावों का संगम है। यह कविता जीवन के इसी सत्य को सरल शब्दों में व्यक्त करती है और हमें सिखाती है कि कर्म, सरलता और परमार्थ के मार्ग पर चलकर ही जीवन के पलों को सार्थक बनाया जा सकता है।

हार और जीत, सुख और दुख, प्रेम और घृणा—जिंदगी इन सभी भावों का संगम है। यह कविता जीवन के इसी सत्य को सरल शब्दों में व्यक्त करती है और हमें सिखाती है कि कर्म, सरलता और परमार्थ के मार्ग पर चलकर ही जीवन के पलों को सार्थक बनाया जा सकता है।
यह कविता आत्मबल, साहस और जीवन संघर्षों के बावजूद आगे बढ़ते रहने की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। इसमें कवि अपने जीवन की यात्रा को एक पर्वतारोहण की तरह प्रस्तुत करता है, जहां रास्ता कठिन है, पर मंज़िल की चाह अडिग है।
प्रारंभिक पंक्तियाँ प्रेरणादायक हैं — आँधियों और तूफानों को भी मात देने वाले उस ‘हौसले के दिए’ की बात होती है, जो अंधेरे में भी मार्ग दिखाता है। इसके बाद कविता सपनों की उड़ान की बात करती है, और बताती है कि थकना, रुकना या पीछे हटना विकल्प नहीं है।
यह एक ऐसा जोश भरा गीत है, जो संघर्षों को गीतों में पिरोकर उन्हें प्रेरणा में बदल देता है। वक्त ने चाहे कितनी भी सख्ती दिखाई हो, लेकिन वक्त ही नई रोशनी भी लाएगा — इस उम्मीद को कवि ने ‘नूर’ और ‘दीप’ जैसे प्रतीकों से दर्शाया है।
“जब दुनिया ने मुँह मोड़ा, राहें सब सूनी थीं,
पापा के आँगन में उम्मीदें बस जीती थीं।
हर हार में उन्होंने मुझे मुस्कराना सिखाया,
हर गिरने पर खुद उठकर चलना सिखाया।
पापा — आप मेरे भगवान हैं इस ज़मीं पर,
आपके बिना ये जीवन अधूरा सा है हर पल।”