तुम कितना बदल गए हो
“मैं तो आज भी वैसी ही हूँ, वही यादों और स्नेह में जीती हुई। बदल गए तो सिर्फ तुम—वो नज़रें, वो बातें, वो अपनापन सब पीछे छूट गया। अगर अब मैं बदल भी गई हूँ, तो सवाल मुझसे नहीं, खुद से करना।”

“मैं तो आज भी वैसी ही हूँ, वही यादों और स्नेह में जीती हुई। बदल गए तो सिर्फ तुम—वो नज़रें, वो बातें, वो अपनापन सब पीछे छूट गया। अगर अब मैं बदल भी गई हूँ, तो सवाल मुझसे नहीं, खुद से करना।”
प्रेम की कथा इतनी सरल नहीं कि शब्दों में बाँधी जा सके। “धरती सब मसि कियो, लेखनी सब बनराई”—यह यूँ ही नहीं लिखा गया। जब प्रेम को लिखना चाहा, तो लेखनी ने हार मान ली। उसमें धूल, राख और व्यापार की कठोरता निकल पड़ी। क्योंकि प्रेम में कोई सौदा नहीं होता, कोई मोल नहीं होता।
कभी प्रेम में एक महामौन था, जिसमें न मिलने का डर था, न खोने का भय। स्त्री अपने घर की नींव संभालने आई, पुरुष घर को भरने कमाने निकला। पर प्रेम की अनुगूँज बहती रही—नदियों में, झरनों में, लहरों में, हवाओं में… बिना कहे, बिना सुने।
जो प्रेम को अभिशाप कहकर कोसता है, वह भी जानता है कि प्रेम होना ही सबसे बड़ा वरदान है। लेकिन प्रेम करने से पहले, उसे समझना, महसूस करना, जीना आना चाहिए।