इज़हार प्यार का: दिल छू लेने वाली प्रेम कविता

इज़हार प्यार का

इज़हार प्यार का” एक भावपूर्ण हिंदी कविता है, जो रिश्तों में विश्वास, जज़्बात और प्रेम की अहमियत को दर्शाती है। यह कविता बताती है कि इज़हार ही रिश्तों को मजबूत और जिंदगी को खूबसूरत बनाता है।

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महिला की गरिमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाती सशक्त कविता, जिसमें बिना शारीरिक स्पर्श के की गई हिंसक दृष्टि और नजरों के अपराध को शब्दों के माध्यम से उजागर किया गया है.

देह नहीं, आत्मा का अपमान

यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.

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हम गज़ल कहने लगे…

जब से लोग खून-खराबे को भी उत्सव का नाम देने लगे, तभी से पुराने घाव फिर से हरे होने लगे। शहर इतना खामोश हो गया है कि हादसों की आवाज़ भी नहीं उठती, क्योंकि यहाँ खुशनुमा चेहरों के बीच कलमें झुककर रह गई हैं। घुँघरुओं का दर्द अब नया नहीं लगता, क्योंकि बारूद से सजे कारवाँ चलने लगे हैं। इशारों की भाषा भी लोगों को समझ नहीं आती, दोस्ती के हाथ बेवजह कटने लगे हैं। सहमी हुई फिज़ाओं में रात भी ढलती नहीं, क्योंकि मोहब्बत के दिए तूफ़ानों से लड़ने लगे हैं। और यही कारण है कि ‘राकेश’ अब सियाह रातों में सर नहीं उठाता क्योंकि जंगें हारने के बाद लोग ग़ज़लें कहने पर मजबूर हो जाते हैं

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कभी-कभी गलतफ़हमी

कभी-कभी हमें भ्रम हो जाता है कि सामने वाला सच में प्यार करता है उसकी बातों में अपनापन दिखता है, इकरार के लम्हे भी सच्चे लगते हैं। वह गले लगकर समझने का दावा तो करता है, पर दुनिया के सामने वही समझ कमज़ोर पड़ जाती है और हमारी नासमझी गिनाई जाती है। मन जैसा चाहे वैसा प्यार दे भी दे, और इल्ज़ामों की बरसात भी उसी मन से कर दे तब रिश्ते बोझ बनते देर नहीं लगती।

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सागर सा वजूद

समुद्र की तरह व्यापक है हमारा वजूद, बस ज़रूरत है उसमें छिपे मोतियों को पहचानने की। जिसकी तलाश में हम दुनिया भर भटकते हैं, वह ख़ुद हमारे भीतर ही छिपा होता है सुकून भी, ख़ुदा भी। भटकते-भागते जीवन में कभी-कभी घर लौटकर देखना चाहिए, शायद वही ठहराव का असली स्थान हो। मन उदास हो तो आकाश की तरफ देखो—वही विशालता दिल को हल्का कर देती है। हार से पहले हार मत मानो; अवसर लौट-लौट कर आते हैं।

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तन भादों, मन सावन

प्रेम में भीगकर तन-मन तरबतर हो जाता है। प्रिय की पनीली निगाहें जब देखती हैं तो भीतर जल-प्लावन-सा उमड़ पड़ता है। बहकी-बहकी हवाएँ चलती हैं तो तन और मन दोनों ही भाव-विभोर हो जाते हैं। मिलन और बिछोह का अनुभव मानो झूलों के आवागमन जैसा प्रतीत होता है। प्रिय के बदन को छूकर गुजरती हवाओं में सागर-सा लावण्य घुल जाता है। जब से वह मन के द्वार पर आया है, तन-मन उसका घर-आँगन बन गया है। अंतरतम में उसके बस जाने से तन मंदिर और मन पावन हो गया है।

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वो साल अच्छा था

“न ये हाल अच्छा है न वो हाल अच्छा था, इस साल से कह दो कि वो साल अच्छा था! इफरात में मिली मोहब्बत को जेब में रखने की जगह न थी, फटी जेब और तंग हाल ही अच्छा था।”

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ज़िंदगी कुछ इस तरह…

वो शाम, वो शहर, वो गुलाब, वो चाय — सब कुछ जो मेरा था, किसी और का हो गया। मेरी हर पसंद, हर भावना, हर छुअन की कल्पना… कोई चुपचाप अपने साथ ले गया। यह कविता नहीं, मेरी बिखरी हुई ज़िंदगी की दास्तान है।

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