तेरी बिंदिया रे…..

जहां शायरों ने, कवियों ने, औरत की सुंदरता के लिए अनेकों उपमानों का प्रयोग किया है, जैसे झील सी गहरी आंखें, हिरण सी सुंदर आंखें, सुराही दार गर्दन, मोरनी सी चाल, वहीं एक प्रेमी, अपनी प्रेमिका की बिंदी पर मर मिटा है,और वह चाहता है कि चाहे वह और कोई श्रृंगार करें या ना करें ,सिर्फ एक छोटी सी बिंदी वह अपने माथे पर लगा ले, और उसे किसी भी उपमान की जरूरत नहीं होगी।

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नीला आसमां

यह कविता एक शांत और भावपूर्ण नीले आसमां के माध्यम से मन की भावनाओं को व्यक्त करती है। मन पर लगे गहरे दाग और संताप, जैसे आसमां का नीला स्वरूप, आँखों के कोरों पर ढलते आँसुओं के साथ मिलकर भावनाओं को उजागर करता है। बिन मौसम की बारिश की तरह मन और आसमां दोनों के धुल जाने से अंततः शांति और स्वच्छता की अनुभूति होती है। यह कविता आंतरिक संताप और उसके समाधान की संवेदनशील यात्रा को दर्शाती है।

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ढूँढें माँ की छाँव

यह कविता गहन भावनाओं और स्मृतियों के माध्यम से माँ और बचपन की छाया की खोज को प्रस्तुत करती है। पहली कविता में माता की ममता और उनके बिना घर की खाली-खाली देहरी की पीड़ा व्यक्त की गई है, जबकि दूसरी कविता में बचपन की नॉस्टैल्जिया और पिता की यादें उजागर हैं। कवि ने मातृत्व, प्रेम और संवेदनशीलता के रसों के साथ भावनाओं की गहराई में जाकर वियोग, याद और आत्मचिंतन का दृश्य खींचा है।

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वो गाँव की कच्ची सड़क…

गाँव के बदलते स्वरूप और उसमें आने वाले शहरीकरण की भावनात्मक तस्वीर पेश करती है। कच्ची सड़कें अब काली, चौड़ी और बदल चुकी हैं, दोनों तरफ हरियाली से लहलहाते खेत अब दुकानों और व्यावसायिक स्थलों में बदल गए हैं। गाँव के लोग और उनकी सरल जीवनशैली धीरे-धीरे शहरी अंदाज़ और मुखौटे में बदल रही है। सुनार की जगह ज्वैलर्स, भड़भूजे और चने की जगह पॉपकॉर्न जैसी चीजें गाँव में जगह लेने लगी हैं। जबकि यह विकास और सुविधा का प्रतीक है, कवि अपने पुराने प्यार और ग्रामीण सादगी को याद करता है और मन में कचोट अनुभव करता है।

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हिन्दी से है पहचान

सुमन दीक्षित, प्रसिद्ध लेखिका, कोलकाता अभिव्यक्ति किसी भी जीव की,ख़ासकर मानवीय संवेदनाओं का,सशक्त माध्यम परिलक्षित होती है—वह हो चाहे किसी भी रूप में…! अगर भाषा की बात आती,तो सम्मान हर भाषा का है;पर हिन्दी तो मेरे लिए जैसेईश्वर का एक वरदान है…! हिन्दी से है पहचान, क्षमता,गौरव भरा होता सदा सृजन।हिन्दी से जुड़ी है आत्मा…

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हिन्दी से है मेरी पहचान

यह कविता हिंदी भाषा के प्रति प्रेम और गर्व को उजागर करती है। हिंदी केवल हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, ज्ञान और संस्कारों का प्रतीक भी है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हिंदी हमारे जीवन, साहित्य और राष्ट्र की आत्मा का अभिन्न हिस्सा है।

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तू ही मेरा श्रृंगार

सविता सिंह मीरा, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर संस्कार, सदाचार,विचार, आचार —तू ही मेरा श्रृंगार। अलंकार, उपहार,आकार, निराकार —सब तेरे ही हैं प्रकार। नदी, पोखर, ताल, तलैया,तू ही सबकी खेवईया।शाखा, वल्लरी, द्रुम, लता,प्रकृति की सुंदर छटा।वर्षा, ओस, बादल, घटा,खग, मृग, बाल गोपाल,राम, केशव, नंदलाल। धूप, छाँव, अंबर, धरा —यह सब तो तेरे हैं रूप।तू ना हो तो…

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तुम “तारा” हो

तुम मेरे आकाशगंगा का तारा हो—जो मेरे ख्वाहिशों के लिए टूटने को तैयार रहती हो, अपनी खुशियों, समय और संसाधनों को बटोरकर भी प्रकाश फैलाती रहती हो। तुम मुझे सपने सच करने का साहस देती हो और सिखाती हो कि दूसरों के लिए भी तारा बनना संभव है।

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राब्ता : एक ग़ज़ल

राब्ता” एक ऐसे दिल की पुकार है, जो अपने ही रिश्ते में दूरी और उदासी महसूस करता है। शिकायत यह नहीं कि मोहब्बत कम है, बल्कि यह है कि समझने और अपनाने की कमी है। ख़्वाब सजाए गए हैं, मगर उन्हें पूरा करने वाली बाहों की गर्मी नहीं मिलती। रक़ीबों की जुर्रत चुभती है, लेकिन अपने परदे की हिफ़ाज़त करने वाला कहीं और खोया रहता है। आईने में भी अब चेहरा नहीं दिखता, क्योंकि नज़रें सिर्फ़ उसी हुस्न की तलाश में हैं। चाँद भी जब उसके दर पर आता है तो उसकी तवाज़ुन खो जाती है। मोहब्बत की क़वायदें शायद काफ़िरों जैसी नहीं होतीं, तभी तो दिल देने के बाद भी सुकून कहीं और नहीं मिलता।

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साथ चलो, बस थोड़ी दूर…

साथ चलो, बस थोड़ी दूर। वक्त को हमसफ़र बनाकर जीवन की इस राह पर कदम बढ़ाते चलो। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो रोज़—कभी तो साथ चलना होगा। रास्तों के मोड़ पर, थकान के क्षणों में, जब भी मन डगमगाए, तुम्हारा साथ राह को आसान बना देगा। दूरियों के बहाने छोड़ो, भीड़ और शोरगुल में भी एक पल का साथ बहुत है। टूटे हुए ख्वाबों की चुभन और धोखे की चोट भले ही हो, फिर भी जिगर की गहराइयों में छिपा अपनापन पुकारता है—थोड़ी दूर साथ चलो। रीलों के इस दौर में, जहाँ जिस्म की नुमाइश ने अपनापन छीन लिया है, वहाँ सच्चा साथ ही सबसे बड़ी ताकत है। नींद भले ही आँखों से कोसों दूर हो, मगर जागे पलों की तन्हाई में यही ख्वाहिश मन को बार-बार पुकारती है—थोड़ी दूर साथ चलो।

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