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मछलियाँ हिंदी कविता पर्यावरण और जल संरक्षण

मछलियाँ…

इन आँखों में बसे असंख्य समंदर कभी हँसी बनकर छलकते हैं, तो कभी अचानक आँसुओं में बदल जाते हैं। जाल से डरती मछलियाँ अतल गहराइयों में खो जाती हैं, जहाँ बिछुड़ने का दुख भी उनके हिस्से आता है। बाज़ार की साज़िशों में उलझा शिकारी सिर्फ़ पकड़ने की भाषा समझता है उसे न जिजीविषा दिखती है, न जीवन की पीड़ा। रंग-बिरंगी मछलियाँ कुछ दिनों का मनोरंजन बनती हैं और फिर गंदे पानी में तड़पकर समर्पित हो जाती हैं। स्वच्छ पानी की अनदेखी में दम तोड़ती मछलियाँ याद दिलाती हैं कि जीवन तभी बचेगा, जब संवेदना बचेगी।

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