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रेडियो स्टेशन पर खामोश होते लम्हे

दौर के विविध भारती स्टेशन पर ‘हमारे मेहमान’ कार्यक्रम के लिए रिकॉर्डिंग तो सिर्फ आधे घंटे चली, लेकिन जब फांसी की पुरानी घटना का जिक्र हुआ, तो माहौल एकदम बदल गया। एनाउंसर सुधा शर्मा जी गीत के बीच अचानक मौन हो गईं — “रहे ना रहे हम, महका करेंगे…” गीत की पंक्तियाँ जैसे कमरे की संवेदना में घुल गईं।
जब मैंने 1996 में उज्जैन सेंट्रल जेल में देखी गई फांसी की घटना सुनानी शुरू की, तो सुधा जी की आँखों से आंसू बहने लगे। वे रुमाल से आँखें पोंछतीं, लंबी साँस भरतीं और कहतीं, “हां भाई साब, आगे बताइए…”
उनका हर सवाल—“सच में देखा?”, “डर नहीं लगा?”, “नींद आ गई थी उस रात?”—एक गहरी संवेदना और जिज्ञासा से भरा था। इंटरव्यू से ज़्यादा वक्त उस घटना की परतें खोलते हुए बीता।

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