भारतीय परिवार की तीन पीढ़ियाँ सम्मानपूर्वक संवाद करती हुईं, जहाँ नई पीढ़ी आत्मविश्वास से अपनी बात रख रही है।

क्या यह कम है ?

क्या संस्कार का अर्थ केवल आज्ञाकारिता है, या सच कहने का साहस भी? यह लेख उस पीढ़ी की कहानी है जिसने स्वयं चुप रहकर जीवन जिया, लेकिन अपने बच्चों को प्रश्न पूछना, तर्क करना और सम्मान के साथ अपनी बात कहना सिखाया।

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किशोरावस्था की मानसिक उलझन और मध्यांतर की अवस्था को दर्शाती संवेदनशील हिंदी कविता

अदृश्य पहरा

यह कविता न बचपन और न जवानी की उस मध्यांतर अवस्था को स्वर देती है, जिसे किशोरावस्था कहा जाता है। बदलती आदतों, माता-पिता की अपेक्षाओं और सामाजिक दबावों के बीच फँसे किशोर मन की उलझन और पीड़ा को यह रचना संवेदनशील ढंग से अभिव्यक्त करती है।

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लेखन मेज़ पर बैठे कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद, पृष्ठभूमि में लमही गाँव और उनकी साहित्यिक विरासत को दर्शाता यथार्थवादी दृश्य।

ये कैसा दिवस?

हर वर्ष हम माता-पिता दिवस मनाते हैं, हिंदी दिवस मनाते हैं, और इसी तरह कई अन्य दिवस भी मनाते हैं। इन्हीं में एक दिन हम कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जन्म दिवस भी मना लेते हैं। फिर सब कुछ समाप्त। क्या एक दिन का स्मरण उनके सम्मान के लिए पर्याप्त है? हम कभी यह सोच भी नहीं पाते कि जिस तरह बंगाल ने रवींद्रनाथ टैगोर के गीत, संगीत, कला और साहित्य को न केवल सहेज कर रखा है, बल्कि उसे अपनी जीवनशैली में आत्मसात किया है — उसी तरह हमें भी अपने साहित्यकारों को सम्मान देना चाहिए। बंगाल का समाज अपने बच्चों को, आधुनिक होते परिवेश में भी, रवींद्रनाथ के प्रति सम्मान भाव से परिचित कराता है। समय-समय पर उनके सम्मान में आयोजन होते हैं।

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