राधाकृष्णन की रोशनी में आज का अँधेरा पढ़ना

आज हम शिक्षक दिवस मनाते हैं—पर यह महज़ कैलेंडर की औपचारिक तारीख़ नहीं, एक विचार की परीक्षा है। इस दिन का अर्थ तभी पूरा होता है जब हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को किताबों के अध्याय से बाहर निकालकर अपने समय की नब्ज़ पर रख दें। वे केवल दार्शनिक, कुलपति या भारत के दूसरे राष्ट्रपति नहीं…

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कक्षा में छात्रों को पढ़ाते हुए शिक्षक, ज्ञान और प्रेरणा का वातावरण

गुरु का स्पर्श, सफलता का मार्ग

शिक्षक वास्तव में जीवन के सृजनहार हैं। जैसे कुम्हार कच्ची मिट्टी को चाक पर घुमाकर आकार देता है, वैसे ही शिक्षक बच्चों के कोमल मन को गढ़कर उन्हें दिशा और स्वरूप प्रदान करते हैं। माता-पिता हमें जन्म देते हैं, परंतु चरित्र की नींव और मूल्यों का उपहार शिक्षक ही देते हैं।
शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाते, वे विचारों को नई धार देते हैं और भविष्य को संवारते हैं। वे बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं, चुनौतियों का सामना करने की क्षमता पैदा करते हैं और सफलता की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाते हैं। जब विद्यार्थी प्रगति पथ पर आगे बढ़ते हैं और नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करते हैं, तो उनकी उपलब्धियों में शिक्षक की मेहनत और प्रेरणा की झलक साफ़ दिखाई देती है।

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रणक्षेत्र में गूंजे सत्य के शाश्वत शब्द

गीता शब्द को सुनते ही मन में जिज्ञासा आना स्वाभाविक है की इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी। भगवान कृष्ण को अपने अलौकिक रूप में आकर रणक्षेत्र के बीच उपदेश देने की आवश्यकता क्यों पड़ी।कहते है उस समय रणक्षेत्र का दृश्य था की एक तरफ कौरवों की सेना दूसरी तरफ पांडवो की सेना थी और अपने ही परिवार जानो को दिख अर्जुन विचलित हो जाते है।

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