कौन हैं वो..?

बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी, अपनेपन की एक बूंद के लिए तरसती वह महिला… थकी हुई आंखों से अपने अस्तित्व को खोजती, सड़क के किनारे किसी निर्जीव वस्तु की तरह पड़ी। कभी अपने अपनों को ममता की छांव देने वाली, आज गैरों से दया की उम्मीद लगाए बैठी है। उसने अपनी पूरी जिंदगी अपनों की फिक्र में, उनके भविष्य को सँवारने में गुज़ार दी, खुद को भुलाकर हर सुख-दुख में उनकी परवाह की। अपनी इच्छाओं को अनदेखा कर, मुस्कुराते हुए हर दर्द सहा। और आज वही अपने, उससे रू-ब-रू होना नहीं चाहते, उसके साए से भी दूर भागते हैं। जिनके लिए उसने सब कुछ त्यागा, उनके पास अब इतना भी वक्त नहीं कि वे उसकी ओर देख लें। उजाले के बीच भी, जिसे कोई पहचानना नहीं चाहता—वह लाचार, उपेक्षित माँ।

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कभी मैं याद आऊँ… तो चले आना

कभी-कभी कुछ यादें सिर्फ प्रश्न नहीं होतीं, वे उत्तर भी नहीं होतीं—वे प्रार्थनाओं जैसी होती हैं, जो किसी के दिल की दहलीज़ पर दीप की तरह जलती रहती हैं। यह कविता नहीं, बल्कि प्रेम की उस शांत पुकार का दस्तावेज़ है जो बिना किसी आरोप या उत्तरदायित्व के, बस यादों की नम परतों में छुपा होता है। जब भी मन थक जाए, कोई मुस्कान याद आ जाए, या बारिश में घुलने की इच्छा हो, तब लौट आने की स्वीकृति देने वाली यह पुकार, प्रेम की सबसे कोमल और निस्वार्थ अभिव्यक्ति है। प्रेम, जहाँ आना जाना नहीं, बस “होना” ही काफ़ी होता है।

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खिड़की के पास बैठा एक अकेला व्यक्ति, हाथ में ख़त लिए, जो इंतज़ार और अधूरे इश्क़ को दर्शाता है

ख़ामोशी के पते

कुछ पतों के पते कभी मिलते नहीं, और कुछ खतों के जवाब लौटकर नहीं आते। ये कविता अधूरी मोहब्बत, अनकहे जज़्बात और खामोश इंतज़ार की एक सजीव तस्वीर पेश करती है—जहाँ भावनाएं शब्दों से कहीं ज़्यादा कह जाती हैं।

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