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शरद अरोरा के मांसाहार त्याग और जीवदया संकल्प का प्रतीक शाकाहारी भोजन

.. अंतर्मन जागा और शरद अरोरा ने छोड़ दिया मांसाहार!

महिदपुर रोड में चातुर्मास और धार्मिक गतिविधियों के बीच शरद अरोरा ने मांसाहार त्यागकर शाकाहार और जीवदया अपनाने का संकल्प लिया. उनका यह निर्णय अहिंसा, करुणा और आत्मपरिवर्तन का प्रेरक संदेश देता है.

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विभिन्न धर्मों के लोग एक साथ खड़े, मानवता और एकता का प्रतीक दृश्य

धर्म क्या है

“धर्म क्या है” एक ऐसी प्रेरणादायक हिंदी कविता है, जो धर्म की वास्तविक परिभाषा को सरल और गहन शब्दों में प्रस्तुत करती है। आज के समय में जब धर्म को अक्सर केवल पूजा-पाठ, रीति-रिवाज और बाहरी आडंबरों तक सीमित कर दिया जाता है, यह कविता हमें उसके मूल स्वरूप की ओर लौटने का संदेश देती है।

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हिंसा और अहिंसा

हिंसा और अहिंसा केवल शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य की सोच और कर्म की दिशा हैं। कोई शरीर को मारता है, कोई मन को—और दोनों ही पीड़ा छोड़ जाते हैं। जो तड़पते को देखकर भी अकड़ जाए, वही सच्ची हिंसा है; और जो बिना कहे दुख हर ले, वही अहिंसा। जीवन की असली परीक्षा वहीं है, जहाँ करुणा सवाल बनकर खड़ी हो जाती है।

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विश्वभर में मनाया गया इंटरनेशनल मीटलेस डे

साधु वासवानी की 146वीं जयंती पर करुणा और शाकाहारी संदेश का उत्सव पुणे से सुरेश परिहार की रिपोर्ट करुणा, शांति और शाकाहारी जीवनशैली के संदेश को समर्पित इंटरनेशनल मीटलेस डे इस वर्ष भी वैश्विक स्तर पर बड़े पैमाने पर मनाया गया। गुरुदेव साधु टी. एल. वासवानी की 146वीं जयंती के अवसर पर दुनियाभर में आध्यात्मिक…

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आजादी का कृष्णपक्ष

आजादी का कृष्णपक्ष**” में कवि स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की उमंग और उल्लास का चित्रण करते हुए हमें याद दिलाता है कि यह आजादी सहज या मुफ्त में नहीं मिली थी। नीति-कुशलता और योजनाओं के बल पर विदेशी शक्तियों ने भारत में अपने पैर जमाए और “सोने की चिड़िया” के घर में लूटपाट मचाई। फूट डालकर शासन करने की नीति ने धर्मों पर संकट और आपसी विभाजन की आग फैलाई।आजादी के स्वप्न देखने वाले वीरों ने प्राणों की आहुति दी, परंतु उन्हें यह आभास भी नहीं था कि स्वतंत्रता के साथ ही देश को बंटवारे का फरमान मिलेगा। इस उपलब्धि में असंख्य जवानियों की कुर्बानी और बंटवारे में छुपी अनेक अनसुनी कहानियाँ शामिल हैं, जिनमें दुख, करुणा, आतंक और दर्द की गहरी परतें छिपी हैं। विभाजन और विस्थापन के दौरान साथ निभाने वालों ने ही घर-द्वार लूट लिए, मानवता पर पशुता हावी हो गई, हिंसा ने अहिंसा को ढक लिया। कवि आने वाली पीढ़ियों को यह सच्चाई बताने का आग्रह करता है कि भारत नफरत और हिंसा की आड़ में खंडित हुआ।

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