इब्तिदा-ए-इश्क
इश्क़ एक ऐसा एहसास है जो शब्दों से परे होते हुए भी कविता में सबसे खूबसूरत ढंग से व्यक्त होता है। “इब्तिदा-ए-इश्क” इसी एहसास की एक झलक है, जहाँ अधूरापन भी एक मुकम्मल कहानी का हिस्सा बन जाता है।

इश्क़ एक ऐसा एहसास है जो शब्दों से परे होते हुए भी कविता में सबसे खूबसूरत ढंग से व्यक्त होता है। “इब्तिदा-ए-इश्क” इसी एहसास की एक झलक है, जहाँ अधूरापन भी एक मुकम्मल कहानी का हिस्सा बन जाता है।
कभी-कभी रिश्तों को नाम देना आसान नहीं होता, क्योंकि वे शब्दों से कहीं ज्यादा गहरे और जटिल होते हैं। यह कविता उसी अनकहे रिश्ते की कहानी कहती है, जिसमें दो लोग साथ तो हैं, लेकिन उस साथ की परिभाषा खुद उनसे भी छुपी हुई है। यह रिश्ता आदत भी है, जरूरत भी, और एक ऐसी भावनात्मक डोर भी, जिसे तोड़ना संभव नहीं लगता।
पुस्तक के पन्नों में दबा एक सूखा गुलाब सिर्फ एक फूल नहीं, बल्कि अनकहे प्यार और मूक संवाद का प्रतीक है। यह कविता उन भावनाओं को शब्द देती है, जिन्हें कभी कहा नहीं जा सका। समय भले ही गुलाब को सुखा देता है, पर उसकी खुशबू और एहसास दिल में हमेशा जीवित रहते हैं। यह रचना हर उस व्यक्ति को छूती है, जिसने कभी खामोशी में भी गहरा प्रेम महसूस किया हो।
दुनिया कहती है कि हर एक सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री होती है!
लेकिन भैया लोग, मैं तो स्पष्टवादी हूँ, कहीं-न-कहीं से हरीशचंद्र जी की फैमिली से जुड़ा हूँ, इसलिए साफ-साफ कहता हूँ कि मेरी असफलता के पीछे मेरी बीवी का ही हाथ है!अब देखिए न, यदाकदा मेरे फेसबुक मित्र मिलते रहते हैं—कभी बाज़ार में, कभी मॉल में, कभी रास्तों पर तो कभी गार्डन में। अक्सर लोग यही कहते हैं—”अनुपम जी, आप अच्छा लिखते हैं, मज़ा आ जाता है, आप अपने लेखों को संकलित करके छपवाइए न।”
वो शाम, वो शहर, वो गुलाब, वो चाय — सब कुछ जो मेरा था, किसी और का हो गया। मेरी हर पसंद, हर भावना, हर छुअन की कल्पना… कोई चुपचाप अपने साथ ले गया। यह कविता नहीं, मेरी बिखरी हुई ज़िंदगी की दास्तान है।
“कुछ रिश्ते होते हैं, जो बिना नाम के भी ज़िंदा रहते हैं। न वे समाज से मान्यता चाहते हैं, न किसी वादे की ज़रूरत होती है। बस एक मौन जुड़ाव होता है—जिसमें न कोई अधिकार होता है, न अपेक्षा। चितरा और सत्य का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही था—जहां भावनाएं थीं, गहराई थी, पर कोई दावा नहीं था। यह प्यार था, लेकिन ऐसा प्यार जो छूने से पहले ही समझ जाता है, जो मिलने से पहले ही विदा ले लेता है। एक ऐसा रिश्ता जिसे शब्द नहीं बाँध सकते, पर आत्मा पहचान लेती है।”
चाय को ना नहीं बोलते साहब, पाप लगता है…” — और इस मासूम से वाक्य ने मोहित की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। वर्षों बाद जब वही चाय की खुशबू और वही बात एक नन्हीं बच्ची ने दोहराई, तो अधूरी कहानी को एक नया अंत मिल गया।
कुछ पतों के पते कभी मिलते नहीं, और कुछ खतों के जवाब लौटकर नहीं आते। ये कविता अधूरी मोहब्बत, अनकहे जज़्बात और खामोश इंतज़ार की एक सजीव तस्वीर पेश करती है—जहाँ भावनाएं शब्दों से कहीं ज़्यादा कह जाती हैं।