gulmohar

इंतज़ार

ज़िंदगी ने बस इतना ही सिखाया है कि इंतज़ार भी एक उम्र माँगता है। न जाने कितनी रातें, कितने दिन तेरी याद में गुज़र गए। खामोशी बहुत कुछ कहती है, पर जब दिल नहीं समझ पाता, मैं फ़िज़ाओं के बीच आकर तेरे दीदार की आस लगा बैठता हूँ। अब तो ये हवाएँ भी थकी-सी लगती हैं .मानो ये भी चाहती थीं कि एक दिन मेरी खामोशी मुस्कान में बदल जाए।

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ऑनलाइन की हरी बत्ती..

हर रात एक ही इंतज़ार स्क्रीन पर उसका ऑनलाइन दिखना। बातों में कुछ ख़ास नहीं, पर उस हरी बत्ती के पीछे जैसे एक रिश्ता साँस लेता है। उसकी हर “गुड मॉर्निंग” कमरे की ख़ामोशी में रोशनी भर देती है, और मैं फिर अगले इंतज़ार में डूब जाता हूँ।

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मैं तुमसे मिलना चाहती हूँ… बस एक बार

रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर आज अमर और सुहानी ने एक क़ैफे में मिलने का तय किया था…अमर आज किसी कारण से सुहानी के शहर आया हुआ था.अमर और सुहानी पहली बार मिलने वाले थे…..अमर ने सुहानी से कई बार मिलने की रिक्वेस्ट की थी. शायद वैसे ही कह दिया करता था, क्योंकि वो भी…

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बालकनी से दिल तक…

शादी के 25 वर्ष बीत गए समय कैसे गुजरा पता ही नहीं चला । अपने परिवार की मर्जी के विरुद्ध किसी लड़के का हाथ थाम कर अपने जीवन सफर पर निकल जाना मेरे लिए कांटों से भरा रास्ता था , पर चुनाव मेरा था और कांटे मिले या फूल यह मेरी किस्मत. समय बदला उनकी ना धीरे-धीरे हां में बदलने लगी

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कागज़ की कश्ती

कविता बचपन की उन मीठी यादों को जीवंत करती है जब बारिश में “कागज़ की कश्ती” सपनों का प्रतीक बन जाती थी। न चिंता थी, न भय—बस मासूमियत और आनंद था। अब वक्त बदल गया है; बारिश, दोस्त और वो बचपन सब पीछे छूट गए हैं। “कागज़ की कश्ती” आज सिर्फ उन सुनहरे दिनों की प्यारी याद बनकर रह गई है।

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“मिलन और बिछोह

**Excerpt:**

कुछ लोग ज़िंदगी में ऐसे मिलते हैं जैसे उनका मिलना तय था — न पहले, न बाद में। वे आते हैं, अपना किरदार निभाते हैं और चले जाते हैं, जैसे कभी थे ही नहीं। पीछे रह जाती हैं उनकी यादें, फोन में उनका नंबर, कुछ जगहें जो अब भी उनकी मौजूदगी की खुशबू से भरी हैं। मिलना जितना सुख देता है, बिछड़ना उतना ही गहरा दर्द छोड़ जाता है।

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एक मुलाकात दीवारों के साथ

एक दीवारों से मुलाकात का अनुभव, जहाँ बचपन, जवानी और यादों की आवाज़ें जीवंत हो उठती हैं। दीवारें सिर्फ मकान का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारे एहसासों, मासूमियत और शरारतों की साझेदार होती हैं। समय के रंग और स्मृतियों की गूंज दीवारों पर जिंदा रहती है, और एक छोटी सी बॉल, एक बच्चा, और पुरानी यादें हमें हमारे अतीत की ओर खींच लेती हैं।

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जीवन चक्र और अंतिम विदाई

50 वर्षों का साथ, सुख-दुख की साझेदारी और परिवार की खुशियाँ — सब एक क्षण में बदल जाती हैं जब जीवन साथी इस संसार से विदा हो जाता है। यह अनुभव अकेलेपन, स्मृतियों और जीवन के चक्र की गहनता को सामने लाता है। इस लेख में हम एक पति के दृष्टिकोण से उस अंतिम विदाई और जीवन के अनुभवों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक परिवार और बच्चों के लिए समर्पण किया।

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डाक चाचा: पत्रों में बसी यादें

डाकिया हमारे बचपन और ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। उनका नाम सुनते ही एक अलग ही दुनिया आंखों के सामने जीवंत हो उठती — खाकी वर्दी, साइकिल की खड़खड़ाहट और हाथों में थैला। वे सिर्फ़ पत्र और पार्सल नहीं लाते थे, बल्कि अपनों का प्यार, उम्मीद और आशीर्वाद भी अपने साथ लाते थे। इस लेख में हम उन दिनों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं, जब हर चिट्ठी का इंतजार दिल की धड़कनें बढ़ा देता था और हर पार्सल में खुशी और उत्सुकता समाई होती थी।

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पुलवामा के बाद की एक माँ की कश्मीर डायरी

यह एक माँ की हिम्मत, आत्मविश्वास और अनुभवों की कहानी है — जो अपने दो बच्चों के साथ अकेले कश्मीर की वादियों में निकल पड़ी। पुलवामा की घटना के बाद जब डर और संदेह ने मन को जकड़ रखा था, तब भी उसने फैसला किया कि ज़िंदगी के इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देगी। डर के उस पार फैली थी बर्फ़ से ढकी पहाड़ों की शांति, मेहमाननवाज़ लोगों का अपनापन और एक माँ के दिल में दर्ज़ हो गई यादों की चमक।

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