पार्थ कहने वाली लड़की
यह लेख एक ऐसे अनमोल रिश्ते की भावनात्मक अभिव्यक्ति है, जहाँ एक लड़की “पार्थ” कहकर केवल पुकारती नहीं, बल्कि टूटते हुए मन को साहस, अपनापन और पहचान भी देती है।

यह लेख एक ऐसे अनमोल रिश्ते की भावनात्मक अभिव्यक्ति है, जहाँ एक लड़की “पार्थ” कहकर केवल पुकारती नहीं, बल्कि टूटते हुए मन को साहस, अपनापन और पहचान भी देती है।
एक सस्पेंस और इमोशनल हिंदी कहानी रीता मिश्रा तिवारी भागलपुर लाइट ऑन करने पर देखा तो दरवाजे पर गिरी पड़ी थी शेफाली..!आवाज़ लगाई पर कोई हरकत नहीं। पानी का छींटा मारा..!” क्या कर रही पागल हो गई है..जगा दिया कितना प्यारा सपना देख रही थी”हड़बड़ा कर उठ बैठी शेफाली। “थैंक गॉड मेरी तो जान ही…
यह कविता सच्ची दोस्ती की गहराई को दर्शाती है, जहाँ एक दोस्त हर मुश्किल में साथ खड़ा रहता है और बिना कहे दिल की बात समझ लेता है।
मित्रता जीवन का वह अनमोल रिश्ता है, जो बिना किसी स्वार्थ के दिलों को जोड़ता है। यह एक ऐसा एहसास है, जिसमें विश्वास, सुकून और अपनापन हर पल साथ चलता है। सच्ची मित्रता न धन-दौलत देखती है, न ही ऊँच-नीच का भेद करती है—यह तो बस दिल से दिल का संबंध होती है। कृष्ण और सुदामा जैसी मित्रता हमें सिखाती है कि सच्चे मित्र हर परिस्थिति में साथ निभाते हैं। प्रेम जहाँ कभी-कभी कसक दे जाता है, वहीं मित्रता हमेशा सुकून और सहारा बनकर जीवन को सरल और सुंदर बना देती है।
कुछ अनकहे रिश्ते” एक मार्मिक कहानी है जो दोस्ती, ममता और विश्वास के उस पवित्र बंधन को दर्शाती है, जिसे नाम की आवश्यकता नहीं होती। यह रचना भावनाओं की गहराई और रिश्तों की सच्चाई को स्पर्श करती है।
यह कहानी एक ऐसे युवा की है जो अपने बीमार भाई के लिए पढ़ाई, करियर और भविष्य तक को दाँव पर लगाने को तैयार है। दोस्ती, परिवार और मानवता जब साथ खड़ी होती है, तो असंभव भी संभव हो जाता है।
नौवीं कक्षा में प्रवेश से पहले साइकिल सीखने का सपना हर छोटे शहर के बच्चे की तरह लेखक के मन में भी पलता रहा। पैसों की कमी, उधारी की सीमाएँ और जुगाड़ के सहारे मिली एक खटारा साइकिल गिरते-पड़ते सीखने की कोशिश और अंत में हुई “क्रैश लैंडिंग” इस कहानी को मासूम बचपन की यादों से भर देती है।
महिदपुर रोड की शंकर सेठ की होटल, और वहाँ डम्प होने वाले अखबार। बचपन का वह लड़का, जो फिल्मों के पोस्टर और शो टाइम्स जानने के लिए हर दिन सुबह निकल पड़ता।
पहले डर और हिचकिचाहट के साथ, धीरे-धीरे वह परिचितों में ढल गया—रामनिवास मंडोवरा काकाजी, कालू दा, चंद्रकांत जोशी। अखबारों के पन्नों में डूबते हुए उसका जुनून बन गया आदत, और फिर लत।शंकर सेठ की होटल सिर्फ एक जगह नहीं थी. वह वह मंच थी जहाँ बचपन की जिज्ञासा और सपने पत्रकारिता की दुनिया में बदलने लगे
जब से लोग खून-खराबे को भी उत्सव का नाम देने लगे, तभी से पुराने घाव फिर से हरे होने लगे। शहर इतना खामोश हो गया है कि हादसों की आवाज़ भी नहीं उठती, क्योंकि यहाँ खुशनुमा चेहरों के बीच कलमें झुककर रह गई हैं। घुँघरुओं का दर्द अब नया नहीं लगता, क्योंकि बारूद से सजे कारवाँ चलने लगे हैं। इशारों की भाषा भी लोगों को समझ नहीं आती, दोस्ती के हाथ बेवजह कटने लगे हैं। सहमी हुई फिज़ाओं में रात भी ढलती नहीं, क्योंकि मोहब्बत के दिए तूफ़ानों से लड़ने लगे हैं। और यही कारण है कि ‘राकेश’ अब सियाह रातों में सर नहीं उठाता क्योंकि जंगें हारने के बाद लोग ग़ज़लें कहने पर मजबूर हो जाते हैं
वी घाव चाटकर बिल्ली को ठीक करती है, कबूतर के मरने पर रोती है, और हर जीव को अपनाने की अद्भुत ताकत रखती है। कभी-कभी लगता है वह बोल नहीं सकती, पर सुनना, समझना और प्रेम बाँटना उसे हम इंसानों से कहीं बेहतर आता है।