Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

बरसात में…

बरसात को जीवन, प्रकृति और मानवीय अनुभवों का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है। बारिश की बूंदें पत्तों और फूलों पर मोती की तरह टपकती हैं, बिजली के तारों पर झिलमिलाती हैं और धरती में अमृत जैसी बूंदों के रूप में समा जाती हैं। वहीं, जर्जर मकान ढहते हैं और लोग अपने घरों और यादों को बचाने के लिए प्रयास करते हैं। शहर और गाँव की सड़कों पर बच्चे बारिश में खेलते हैं, नदियाँ अपने भीषण बहाव में सब कुछ बहा लेती हैं, और जानवर तथा पक्षी अपनी परिस्थितियों से जूझते हैं। इसके बीच, बरसात जीवन में रिश्तों, साहस और मानवीय संवेदनाओं को पुनर्जीवित करती है। कविता यह दर्शाती है कि बरसात का सौंदर्य और जीवन में उसकी भूमिका पहले जैसी रह गई है, लेकिन अब वह पहले जैसी रूमानी नहीं लगती।

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इसी तरह सोचो

यह कविता जीवन और संघर्ष की कठिनाइयों में महिलाओं को आत्मनिर्भर और साहसी बनने का संदेश देती है। कविता में बताया गया है कि जैसे लोहा आग में पिघलकर भी अपनी ताकत नहीं खोता, वैसे ही महिलाओं को भी कठिन परिस्थितियों में अपने साहस और आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। ‘बिटिया’ के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि जीवन के जंगल में जिंदा रहने के लिए हिम्मत, धैर्य और साहस आवश्यक हैं।

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मैं सच को बयां करती हूं

डॉ.नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध साहित्यकार, उज्जैन मैं सच को बयां करती हूंअंगारों पर चलती हूंमैं गीत नए रचती हूंख्वाब नए चुनती हूं गहन तम को चीरकरअरुणिमा जगाती हूंटूटकर बिखरती हूंखुद को पिरो लेती हूं सूरज से आग लिएदीपक से राग लिएधरती का हरितस्वप्नआंचल में सजाती हूं कांटो की पृष्ठ परफूलों की कलम सेवसंत की आस लिएपतझड़…

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बस अब और नहीं 

सान्वी ने सुबह की सारी व्यस्तताओं से निवृत्त होकर बालकनी में बैठकर बारिश की बूंदों को निहारना शुरू किया। उसी समय उसके भीतर लंबे समय से चल रहे संघर्ष और आंतरिक तूफ़ान ने नया रूप ले लिया। अतीत के घाव, निराशा और खुद से होने वाली आत्मग्लानि ने उसे झकझोर दिया। और तभी उसने ठान लिया. बस, अब और नहीं!”उसने अपने अनवरत युद्ध को विराम देने का साहस जुटाया, और अपने अंतर्मन पर पूर्ण नियंत्रण पाकर आत्मा की जीत का अनुभव किया।

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माँ के दो हाथों की टोकरी

माँ के दो हाथों की टोकरी में ज़िंदगी सिमटी रहती है। कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएँ हैं, बिल्कुल सटीक नहीं, लेकिन उनमें वही अपनापन है जैसे माँ की हथेलियाँ। वह टोकरी, जिसमें माँ एक जीवन को सम्भालकर रखती है, उसे पालती-पोसती है, दुलारती है। समय बीत गया, दुनिया बदली, मैं भी बहुत बदल गई, पर तेरे भीतर अब भी वही मासूमियत है—वही छोटे-से बच्चे की छवि, जो छोटी-छोटी गलतियाँ दोहराता है और माँ की हथेली पर सुरक्षित रहता है। लेकिन इस जंगल जैसी दुनिया में तुझे कैसे रखूँ? यही सोचकर दिल कांप जाता है। आ जा फिर मेरी हथेली में, छुप जा आंचल में, चैन से सो जा। इस भागदौड़ और छल-कपट को भूल जा, क्योंकि यह जीवन-जंगल कोई खेल नहीं। इसका अंत केवल एक “जंगल-आग” है।

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ये मूर्तिकार

यह मूर्तिकार, जो छेनी-हथौड़ी से पत्थरों को तराशते-तराशते खुद भी एक पाषाण शिला सा बन गया है। उसके भीतर का प्रेम कहीं उसकी बनाई मूर्तियों में समा गया, या कहें कि बुत बनकर रह गया। कल जो प्रेम से लबालब था, आज वह भीतर से सूख चुका है—दरकती पपड़ी जैसा। समय की नश्वरता को समझते हुए भी उसने उसे नज़रअंदाज़ किया, क्योंकि उसके जीवन में अब बस औज़ारों का ही महत्व रह गया है। यही औज़ार उसके जीवनयापन का साधन हैं, उसकी भूख मिटाने का माध्यम हैं—उसका एकमात्र साथ।

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