Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

नींद

यह कविता अनिद्रा की उस गहरी अवस्था को चित्रित करती है, जहाँ शरीर थक चुका होता है लेकिन मन लगातार सक्रिय रहता है. रात भर जागती सोच, तकिये के नीचे दबी अनकही बातें और स्थिर घड़ी की सुइयाँ जीवन की थकान और मानसिक बोझ को प्रतीकात्मक रूप में सामने लाती हैं. सुबह होने पर भी रात का जागना भीतर बना रहना, आधुनिक मनुष्य की मानसिक बेचैनी को सशक्त रूप से व्यक्त करता है.

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Open diary on a wooden desk with yellowed pages and blurred handwritten words, sunlight falling on it, symbolizing confinement, emotional struggle, and the longing for freedom, with a distant view of open sky and flying birds through the window.

डायरी – कुछ कहानियां…

डायरी के पन्नों में कैद होती हैं वे कहानियां, जो जीवन की मजबूरी और अपमान की गवाही देती हैं। खुला आसमान और उन्मुक्त पंछियों की उड़ान उनके लिए सपना बन जाती हैं, परन्तु उनके शब्द अपनी बेबसी और तिरस्कार की कहानी बयाँ करते हैं।

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ज़िंदगी के नाम एक ख़त

ज़िंदगी के नाम लिखा गया एक आत्मीय ख़त है, जिसमें जीवन की सुंदरता और कठिनाइयों दोनों को स्वीकारते हुए, उससे साथ निभाने और हर हार में संबल देने की विनती की गई है।

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महंगाई

आज की महंगाई ने जीवन को बहुत मुश्किल बना दिया है। हर चीज़ की कीमत बढ़ गई है और आम आदमी का घर चलाना कठिन हो गया है। पहले जो छोटी-सी चीज़ें आसानी से मिल जाती थीं जैसे मोटर या भिंडी . अब उन्हें खरीदना भी मुश्किल हो गया है। तेल न होने पर खाना बनाना भी मुश्किल हो जाता है और परेशानियाँ बढ़ जाती हैं। लोग पूछते हैं तो कुछ कह नहीं पाते, और ना पूछें तो मन में ही दुःख बढ़ता रहता है। महंगाई की मार से जीवन इतना जटिल हो गया है कि इसे अनदेखा करना भी मुश्किल है।

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“कंधों पर दुनिया, आँखों में समंदर”

पुरुष ज़ुबां से कम बोलते हैं, पर उनकी आँखें सब कह देती हैं. प्यार, फ़िक्र, थकान और छुपी हुई नमी। ज़िम्मेदारियों में दबे हुए भी वे घर की जड़ बनकर सबकी खुशी में खुद को भूल जाते हैं।

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क्या बुज़ुर्ग सच में अकेले पड़ रहे हैं?

84 साल की उम्र में 16वीं मंज़िल से छलांग लगाकर आत्महत्या इस घटना ने मुझे भीतर तक हिला दिया। उम्रभर की लड़ाइयाँ जीतने वाला इंसान अंतिम पड़ाव पर इतना टूट जाता है कि जीवन ही बोझ बन जाए, यह हमारे समाज और मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

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दिया और कुम्हार

कविता उस कुम्हार की करुण कथा कहती है, जो मिट्टी के दिये बनाकर दुनिया के हर घर में उजाला फैलाता है, पर उसका अपना जीवन अंधकार में डूबा रहता है। वह दिन-रात मेहनत करता है ताकि अपनी बेटी की पढ़ाई, विवाह, माता-पिता की दवा और दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम कर सके। फिर भी लोग उसके परिश्रम की कीमत पर सौदा करते हैं, मानो एहसान कर रहे हों। त्योहार की चमक में उसकी मेहनत की सच्चाई गुम हो जाती है।

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जीवन चक्र और अंतिम विदाई

50 वर्षों का साथ, सुख-दुख की साझेदारी और परिवार की खुशियाँ — सब एक क्षण में बदल जाती हैं जब जीवन साथी इस संसार से विदा हो जाता है। यह अनुभव अकेलेपन, स्मृतियों और जीवन के चक्र की गहनता को सामने लाता है। इस लेख में हम एक पति के दृष्टिकोण से उस अंतिम विदाई और जीवन के अनुभवों की झलकियाँ साझा कर रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक परिवार और बच्चों के लिए समर्पण किया।

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स्वाभिमान

हर रोज मैट्रो स्टेशन पर भीख मांगती वह अंधी भिखारन मेरी नजरों के सामने होती।
एक दिन उसकी तबियत ठीक न होने पर मैंने देखा कि उसकी देखभाल एक जवान लड़की कर रही थी। कई सालों के दर्द और असहायता के बावजूद, उस बच्ची ने उसकी सेवा को अपना स्वाभिमान बना लिया। भीख मांगना नहीं, बल्कि सहयोग और मानवता की यही असली पहचान है।

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मैं कैसे हार मान लूं…

यह प्रेरणादायक लेख ज़िंदगी के संघर्षों और कठिनाइयों के बीच उम्मीद और दृढ़ता का संदेश देता है। लेखक बताती हैं कि हर ठोकर, हर असफलता और हर कठिन समय हमें मजबूत बनाता है। हार मानना केवल सपनों और उम्मीदों को छोड़ देना है। जीवन की जीत सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि हमारे परिवार, समाज और सपनों की जीत है। यह रचना हमें याद दिलाती है कि जब तक साँस है, तब तक उम्मीद है, और हमारे दिल की आवाज़ हमेशा यही कहती है—“मैं कैसे हार मान लूं?”

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