पल्लू में बँधा आसमाँ

माँ की पुरानी नीली साड़ी को हाथों में थामे भावुक बेटा और विवाह के जोड़े में वही साड़ी ओढ़े दुल्हन

भारती सोनी, उज्जैन

माधव जब भी अपनी माँ के पुराने लकड़ी के बक्से को खोलता, तो उसमें से चमेली के तेल और सूखे कपूर की एक जानी-पहचानी खुशबू उठती थी। माँ के गुज़रने के तीन साल बाद भी उस बक्से की हर चीज़ वैसी ही थी—उनकी चश्मा रखने की डिब्बी, कुछ पुरानी रसीदें और सबसे नीचे रखी वह ज़री के बॉर्डर वाली आसमानी नीली कॉटन-सिल्क की साड़ी।

वह साड़ी कोई मामूली कपड़ा नहीं थी। माधव के बचपन का पूरा सुरक्षा-कवच उसी पल्लू में समाया हुआ था। जब बचपन में आँधी-तूफ़ान आता या बिजली कड़कती, तो वह माँ के इसी पल्लू के पीछे मुँह छिपा लेता था। रोते समय पल्लू से आँखें पोंछना और बुखार में माँ का उसी पल्लू को पानी में भिगोकर उसके माथे पर रखना—वह साड़ी मानो माँ का ही एक हिस्सा बन चुकी थी।

माधव अब शहर में एक सफल आर्किटेक्ट बन चुका था। उसकी शादी तय हो चुकी थी। शादी की तैयारियाँ जोरों पर थीं, लेकिन माधव का मन किसी गहरी उलझन में था।

एक शाम उसकी मंगेतर अनन्या उसके घर आई। उसने देखा कि माधव कमरे में अकेला बैठा उस आसमानी साड़ी को हाथों में लिए टकटकी लगाए देख रहा है।

“क्या सोच रहे हो, माधव?” अनन्या ने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।

माधव ने एक ठंडी साँस ली, “अनन्या, माँ हमेशा कहा करती थीं कि जब मेरी बहू पहली बार इस घर की चौखट पार करेगी, तो वे उसे अपने हाथों से यह साड़ी पहनाएँगी। लेकिन… अब यह साड़ी पुरानी हो चुकी है। इसका रंग भी थोड़ा फीका पड़ गया है और ज़री के धागे भी निकल रहे हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि इसका क्या करूँ।”

अनन्या ने कुछ नहीं कहा। उसने मुस्कुराकर माधव के हाथ से वह साड़ी ली, उसे बड़े प्यार से समेटा और अपने साथ ले गई।

शादी वाले दिन मंडप में फेरों का समय आया। माधव वेदी पर बैठा अनन्या का इंतज़ार कर रहा था। तभी ढोल-नगाड़ों की आवाज़ के बीच अनन्या ने मंडप में कदम रखा।

उसे देखते ही माधव की आँखें फटी की फटी रह गईं और उसकी हलक में साँस अटक गई।

अनन्या ने कोई आम, भारी-भरकम बाज़ारी लहँगा नहीं पहना था। उसने एक बेहद खूबसूरत, आधुनिक डिज़ाइन का शादी का जोड़ा पहना हुआ था, लेकिन उसकी चोली और दुपट्टे में वही माँ की आसमानी साड़ी का रेशम और ज़री बेहद नफ़ासत से तराशकर जोड़ी गई थी। पल्लू का वह मुख्य हिस्सा, जिस पर माँ के हाथों के स्पर्श की यादें थीं, अनन्या ने अपने सिर के दुपट्टे के रूप में ओढ़ रखा था।

अनन्या जब वेदी पर माधव के बगल में बैठी, तो उसने माधव की ओर देखकर फुसफुसाते हुए कहा, “तुम्हारी माँ की धरोहर को फेंकने या अलमारी में बंद रखने की ज़रूरत नहीं थी, माधव। उन्हें तो आज तुम्हारे और मेरे, दोनों के साथ होना था।”

माधव की आँखों से एक आँसू छलककर अनन्या के उस दुपट्टे पर जा गिरा। उस पल, मंडप की जगमगाती रोशनियों के बीच माधव को लगा कि ऊपर से माँ मुस्कुरा रही हैं और उनका पल्लू आज भी उसके सिर पर छाँव बनकर तना हुआ है।

3 thoughts on “पल्लू में बँधा आसमाँ

  1. बहुत सुंदर कहानी। यादों की अहमियत हर सोने चाँदी से बढ़ कर है।

  2. एक सत्य घटना पर आधारित कहानी

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