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उसका श्रृंगार: गीले बाल, काजल और सादगी पर भावपूर्ण कविता

काजल, ख़ामोशी और तुम

एक स्त्री का सबसे सुंदर श्रृंगार क्या है? गीले बाल, काजल की पतली-सी लकीर, होंठों की हल्की मुस्कान या उसकी सादगी? यह कविता बाहरी आभूषणों से आगे बढ़कर उस सहज सौंदर्य को महसूस कराती है, जो बिना किसी बनावट के दिल में उतर जाता है। प्रकृति के बिंबों और गहरे एहसासों से सजी यह रचना सादगी, प्रेम और स्त्री की स्वाभाविक सुंदरता को शब्द देती है।

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पर्णकुटी और कोंगा सॉफ्टवेयर द्वारा महिलाओं को मिला स्वरोजगार

पर्णकुटी संस्था और कोंगा सॉफ्टवेयर प्रा. लि. की ओर से जरूरतमंद महिलाओं को स्वरोजगार के लिए आर्थिक सहयोग और सामग्री प्रदान की गई। इस उपक्रम के तहत कुल 10 महिलाओं को बिजनेस किट्स दी गईं। इनमें से तीन महिलाओं को सिलाई मशीनें, चार महिलाओं को एडवांस ब्यूटी पार्लर किट्स और तीन महिलाओं को व्यवसाय शुरू करने के लिए कुल 32,500 रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की गई। यह कार्यक्रम सामाजिक दायित्व (CSR) के अंतर्गत स्वयंरोजगार और कौशल विकास अभियान** के रूप में आयोजित किया गया। इस अवसर पर अभिनेत्री तथा *अस्मिता महाराष्ट्राची* संस्था की संचालिका अंकिता शिवतारे और पर्णकुटी की सह-संस्थापक स्नेहा भारती मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थीं। उनके हाथों लाभार्थी महिलाओं को स्वरोजगार सामग्री वितरित की गई।

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अपनी बारी

ऑटो से उतारना, पसीना पोंछना, पानी पिलाना और कंधे पर भार उठाकर घर ले जाना—सास के लिए बहू का यह समर्पण रोज़ देखने को मिलता था। पूछने पर उसने मुस्कुराकर कहा, “मेरे बच्चों को इन्होंने फूल जैसा पाला है… अब मेरी बारी है।”

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शायद ये इत्तेफ़ाक ही था…

एक संयोग-भरी ट्रेन यात्रा में सामने बैठी एक सभ्रांत, गुमसुम महिला ने लेखक की आत्मा को अनकहे शब्दों से छू लिया। उसकी उदास आँखों में जैसे कई अनलिखी कहानियाँ थीं, और उसकी खामोश मुस्कान में छिपे इंद्रधनुषी रंग बार-बार पुकारते थे। दो मुसाफ़िर कुछ पल साथ, फिर अपने-अपने स्टेशनों की ओर। समय बीत गया, उम्र बढ़ी, लेकिन उस अनाम उदासी भरे चेहरे की याद दिल की तहों में आज भी महफ़ूज़ है।

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कभी तुम्हारा कभी हमारा

ज़िंदगी कभी हमें सहारा देती है, कभी हम दूसरों के लिए सहारा बन जाते हैं। हालात चाहे जैसे हों, अमीर हो या ग़रीब, सबको तमीज़ से पेश आना होता है। भूख-प्यास, सुख-दुःख, किनारा या तूफ़ान — ये सब कभी तुम्हारे हिस्से आते हैं, कभी हमारे। यही जीवन का सच है कि नज़ारा बदलता रहता है और हर किसी की बारी आती है।”

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अस्पताल के कमरे में आँसू भरी आँखों वाली भारतीय युवती बेहोश युवक का हाथ थामे खड़ी है, पास में चिंतित भाई खड़ा है।

मैं फिर जीत गई

“मैं फिर जीत गई” एक संवेदनशील कहानी है, जिसमें माया और मिलिंद के रिश्ते, सपनों को उड़ान देने वाला प्रेम, और जीवन की कठिन घड़ी में विश्वास की जीत को खूबसूरती से उकेरा गया है।

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विभिन्न वर्गों के लोग एक साथ खड़े, समानता और एकता का प्रतीक

समरस समाज

भेदभाव की दीवारें टूटें,और मानवता समाज की नींव बने. यही सच्ची प्रगति है।जब हर व्यक्ति को समान अधिकार मिलेगा,तभी एक सशक्त और समरस समाज का निर्माण होगा।

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असली दीवाली: दिखावे नहीं, परिवार की खुशहाली में

डाॅ उर्मिला सिन्हा प्रसिद्ध साहित्यकार, रांची (झारखंड) दीवाली का त्यौहार आ पहुंचा।गौरी साफ-सफाई, रंग-रोगन, पूजा की तैयारी… बेटे की प्रतियोगी परीक्षा, बिटिया का फाइनल एग्जाम… बूढ़े सास-ससुर की देखभाल… पति के नखरे अलग… क्या करे, क्या छोड़ दे।सीमित आमदनी, खर्चे हजार… नाते-रिश्तेदारों का स्वागत-सत्कार। एक आम मध्यमवर्गीय, संवेदनशील परिवार की यही कहानी।खैर, काम निबटते गए……

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जीवन, प्रकृति और अनुभूति पर आधारित हिंदी कविता “मैं कविता हूँ” का भावात्मक चित्र

मैं कविता हूँ…

मैं कविता हूँ” केवल शब्दों की रचना नहीं, बल्कि जीवन की अनुभूतियों का स्वीकार है। दुख, सुख, प्रकृति और समय के बीच कविता स्वयं को खोजती और सदा जीवित रहती है।

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डर नहीं, दहाड़

अनिता की यह कहानी एक सामान्य-सी नौकरी से शुरू होकर शक्ति, साहस और आत्मसम्मान की विस्फोटक लड़ाई में बदल जाती है। स्कूल डायरेक्टर की कुटिल नीयत, मानसिक खेल और डराने-धमकाने की हर कोशिश को ध्वस्त करते हुए अनिता जिस तरह अपने स्वाभिमान की रक्षा करती है, वह हर उस लड़की की आवाज बन जाती है जो कार्यस्थल पर चुपचाप अन्याय सहती है।

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