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नऊवारी का नूर

गणेश उत्सव में नऊवारी साड़ी पहने महाराष्ट्रीयन महिलाएं गणेश उत्सव में पारंपरिक नऊवारी साड़ी महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को खूबसूरती से प्रस्तुत करती है.
vijya dalmiya

विजया डालमिया, हैदराबाद

हमारा देश विविधताओं से भरा हुआ है। संस्कृति, वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन, बोली और विचारों में भिन्नता होने के बावजूद हमारे त्योहार हमें एक सूत्र में बाँधते हैं। हर प्रांत का अपना विशिष्ट पर्व होता है, जिसके पीछे उसकी सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक पहचान जुड़ी होती है। गणेश उत्सव आते ही महाराष्ट्र में उत्साह और उमंग की धूम मच जाती है। दस दिनों तक चलने वाला यह उत्सव विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता गणेश जी को समर्पित होता है। हर कोई अपने-अपने तरीके से मंगलमूर्ति को रिझाता है। कहते हैं, जब हम भगवान के सामने स्वयं को समर्पित करते हैं तो वे फलस्वरूप हमें ‘तथास्तु’ कहते हैं। शायद यही कारण है कि उनके दरबार में जाने के लिए लोग अपने पहनावे पर भी विशेष ध्यान देते हैं।

गणेश उत्सव के दौरान महिलाएँ खास तौर पर पारंपरिक रूप में अपनी खूबसूरती का जलवा बिखेरती नजर आती हैं। इन दिनों महाराष्ट्रीयन फैशन की खूब धूम रहती है। ‘बाजीराव मस्तानी’ में प्रियंका चोपड़ा का महाराष्ट्रीयन अंदाज़ हो या माधुरी दीक्षित का पारंपरिक मराठी रूप—महाराष्ट्रीयन परिधान की खूबसूरती हमेशा आकर्षित करती रही है। इतिहास के पन्नों में भी महारानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना का नऊवारी साड़ी में व्यक्तित्व शक्ति और साहस की मिसाल रहा है।

महाराष्ट्र की शान-नऊवारी साड़ी

नऊवारी साड़ी महाराष्ट्र की शान है। ‘नऊ’ यानी नौ और ‘वारी’ यानी गज। लगभग नौ गज लंबी होने के कारण इसे नऊवारी कहा जाता है। इसे ‘अखंड वस्त्र’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसे इस तरह पहना जाता है कि इसके साथ किसी अन्य निचले परिधान की आवश्यकता नहीं होती।रोजमर्रा के कामों के लिए सूती नऊवारी सुविधाजनक मानी जाती है, जबकि पूजा-पाठ और विशेष अवसरों पर रेशमी नऊवारी पहनने का चलन है। इसमें छोटे-छोटे बूटे और सुनहरी जरी की बॉर्डर इसकी खूबसूरती बढ़ा देती है। हालाँकि, नऊवारी साड़ी की असली खासियत केवल उसके कपड़े में नहीं, बल्कि उसे बाँधने के अंदाज़ में है।

नऊवारी बाँधने के कई लोकप्रिय तरीके हैं—ब्राह्मणी साड़ी, पारंपरिक मराठी साड़ी, पेशवाई मराठी साड़ी, कोली और किसान साड़ी। इसका मूल स्टाइल ‘काष्टा’ माना जाता है, जिसमें साड़ी के बॉर्डर को पीछे की ओर खोंसा जाता है।पेशवाओं के समय में महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले अंदाज़ को आगे चलकर ‘पेशवाई’ शैली के नाम से जाना जाने लगा।

ब्राह्मणी नऊवारी

ब्राह्मणी नऊवारी साड़ी का अंदाज़ बेहद लोकप्रिय है। इसमें बेसिक गांठ लगाने के बाद बाईं ओर के खुले हिस्से को ऊपर मोड़ते हुए टक किया जाता है, जिससे डबल बॉर्डर का खूबसूरत लुक दिखाई देता है। इसके बाद प्लेट्स बनाकर उन्हें दो हिस्सों में बाँटा जाता है। बाईं ओर की प्लेट्स को काष्टा बनाते हुए पीछे टक किया जाता है, जबकि दाईं ओर की प्लेट्स को आगे की तरफ व्यवस्थित करके टक किया जाता है।

पेशवाई स्टाइल

पेशवाई स्टाइल में भी बेसिक प्लेट्स पहले की तरह बनाई जाती हैं। इसके बाद बाईं ओर की प्लेट्स को पीछे की तरफ टक किया जाता है और दाईं ओर की प्लेट्स को जिग-जैग अंदाज़ में आगे की ओर व्यवस्थित किया जाता है। यह शैली पारंपरिक होने के साथ-साथ बेहद आकर्षक भी लगती है।

पारंपरिक नऊवारी

पारंपरिक नऊवारी एक गांठ पर टिकी होती है। साड़ी के हिस्से को लेकर दाईं ओर गांठ लगाई जाती है और फिर पल्लू की लंबाई नापते हुए उसे व्यवस्थित किया जाता है। चूँकि साड़ी नौ गज की होती है, इसलिए इसकी प्लेट्स भी अपेक्षाकृत चौड़ी बनाई जाती हैं। सामने की दो प्लेट्स से बाकी प्लेट्स को कवर किया जाता है और साड़ी के बॉर्डर को बाहर निकालते हुए कमर पर प्लेट्स से बेल्ट जैसा लुक बनाया जाता है। इसके बाद सारी प्लेट्स को दो भागों में बाँटकर बाईं ओर एक प्लेट अधिक रखी जाती है। प्लेट्स को पीछे ले जाकर बॉर्डर को सीधा करते हुए अंदर की ओर टक किया जाता है। दोनों बॉर्डर आपस में जुड़े हुए दिखाई दें—यही खूबसूरत अंदाज़ ‘काष्टा’ कहलाता है।

नऊवारी के साथ श्रृंगार भी खास

महाराष्ट्र में विभिन्न पर्वों और उत्सवों पर नऊवारी पहनकर महिलाएँ अलग ही आभा बिखेरती हैं। इस पारंपरिक परिधान की खूबसूरती को चार चाँद लगाती है उनकी पारंपरिक ज्वेलरी।नाक में सजी नथ, कानों में मोतियों की बुगड़ी, बालों में बना सुंदर जूड़ा और उस पर सजा गजरा मराठी श्रृंगार की पहचान बन जाते हैं। खासकर नऊवारी साड़ी के साथ नथ और गजरा बेहद सुंदर दिखाई देते हैं।इसके साथ मैरून रंग की चाँद के आकार वाली बिंदी और कोल्हापुरी चप्पल पहनते ही पूरा महाराष्ट्रीयन लुक जैसे जीवंत हो उठता है।गणेश उत्सव की रौनक में जब ढोल-ताशों की गूँज होती है, माथे पर बिंदी, नाक में नथ और बालों में गजरा सजाए महिलाएँ नऊवारी में कदम बढ़ाती हैं, तो लगता है जैसे महाराष्ट्र की परंपरा अपनी पूरी शान के साथ उत्सव के बीच उतर आई हो।

नऊवारी केवल नौ गज का वस्त्र नहीं,

महाराष्ट्र की संस्कृति, नारी के आत्मविश्वास और उसकी परंपरा की खूबसूरत पहचान है।

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