रीता मिश्रा तिवारी की लंबी कहानी का पांचवा भाग

रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर
“एक बात पूछूँ..!”
“पूछिए न, दादू..”
“क्या उसे अपना देश, अपनी मिट्टी, अपने घर-परिवार की याद नहीं आती..? क्या वह अपने घर कभी वापस नहीं आएगा…?”
“दादू..! घर-परिवार कभी छूटता नहीं है, बस महत्वाकांक्षाओं की परत चढ़ जाती है। रिश्ते तो दिलों से बनते हैं, दूरियों से नहीं। आप देखना, वो दिन दूर नहीं, जब अपने देश की मिट्टी की खुशबू वापस खींच लाएगी उन्हें।”
रवि की नज़रों से श्यामबाबू की आँखों में तैरता आँसू छिप न सका। उनके दर्द को भली-भाँति समझता था। अच्छी तरह जानता था वो कि उसके डैडी बेटे से दूर नहीं रह सकते।
वो दिन जल्द आएगा।
एक दिन श्यामबाबू बरामदे में अपनी पुश्तैनी आरामकुर्सी पर बैठे चाय की चुस्की ले रहे थे और रवि वहीं ज़मीन पर चटाई पर बैठकर लैपटॉप पर काम कर रहा था।
आज श्यामबाबू ने खाना बनाने वाली को मेनू में पुलाव, पनीर की सब्ज़ी, बूंदी का रायता और खीर बनाने को कहा था।
रवि जानता था कि आज डैडी का जन्मदिन है।
ये बात दादू को बोलकर दुखी नहीं करना चाहता था।
भोजन का जो मेनू था, वो डैडी का फेवरेट था।
रवि अनभिज्ञ था कि श्यामबाबू ये बात जानते हैं और उन्हें अच्छी तरह से सब याद है।
वो श्यामबाबू के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहा था। किंतु चंद मिनटों में ही उनके चेहरे का भाव बदल जाता।
हारकर रवि ने अपना ध्यान लैपटॉप पर केंद्रित किया।
तभी बाहर दरवाज़े पर गाड़ी रुकने की आवाज़ आई।
दरवाज़े पर आए आगंतुक के स्वागत में श्यामबाबू छड़ी की सहायता से गेट तक पहुँचे।
कॉलिंग बेल अनवरत बज रही थी।
“अरे बाबा, खोल रहा हूँ। क्यों बेसब्र हुए जा रहे हो? बूढ़ी काया है, आने में समय तो लगेगा।”
दरवाज़ा खोलते ही, बालों में सफेदी, आँखों पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा, कलाई पर सुनहरी चेन की घड़ी, उँगली में सोने जड़ित माणिक और पन्ने की अँगूठी, सूट-बूट में सामने जो इंसान खड़ा था, उसे देखकर श्यामबाबू असहज हो गए।
ऊपर से नीचे तक अवलोकन किया।
“माफ़ करिए, पहचाना नहीं हमने। कौन हैं आप?
अच्छा..! शायद रवि..! बेटा, देख, कोई तुमसे मिलने आया है।
सर्दी बहुत है, आइए अंदर आइए..!”
रवि उस आगंतुक को देखकर हैरान था, परंतु उसके चेहरे पर एक संतोष था। अनायास उसके होंठों पर मुस्कुराहट तैर गई।
वो इस बात से हैरान था कि इतनी जल्दी इनका आगमन, ये सोचा नहीं था। खैर, दादू के व्यवहार और उनकी बात सुनकर चुप रहना बेहतर समझा।
दादू की नज़रों से बचकर उसने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत और नमस्कार किया और बैठने का आग्रह किया।
उन दोनों का मिलाप कैसे होता है, वो ये देखना चाहता था।
आगंतुक को उम्मीद थी कि सामने वाला शख़्स उसे देखकर रो पड़ेंगे।
गले लगाकर प्यार करेंगे या गुस्सा करेंगे..!
किंतु,
“पहचाना नहीं, आप कौन?” ये शब्द उस आगंतुक के सीने में टूटे शीशे की तरह चुभ गए।
