बादल फटने की त्रासदी

वर्ष 1983 में मेरी प्रथम प्रशासनिक तैनाती के दौरान अल्मोड़ा जिले के दूरस्थ करमी गाँव में घटित बादल फटने की घटना ने मुझे पहाड़ों में जीवन और प्राकृतिक आपदाओं की भयावहता का जीवंत अनुभव कराया। पैदल मार्ग से उच्च पहाड़ी इलाक़ों तक पहुँचना कठिन था, लेकिन गाँववालों की व्यथा और घटना के दृश्य ने मेरी संवेदनाएँ झकझोर दीं। इस घटना में लोगों के घर बह गए, कई लोग घायल हुए और मृतक भी हुए। उस समय का अनुभव आज भी मेरी स्मृति में जीवंत है और यह प्रशासनिक कार्य के दौरान मिली असली चुनौती और सीख का प्रतीक बना।

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बहुत जी करता है

मैं जीना चाहती हूँ उन क्षणों को जब ब्रज में कृष्ण अपनी लीलाएँ रचते थे। नटनगर रास, बंसी की मधुर तान, गोपियों की हँसी और उनका अनन्य प्रेम—हर दृश्य हृदय में जीवंत हो उठता है। मैं देखना चाहती हूँ यशोदा मैया का लाल संग खेलना, सुदामा का स्नेह, और कान्हा की माखन चोरी। कभी-कभी लगता है कि यह भाव किसी पुराने युग की स्मृति है—शायद मैं भी कोई गोपी थी या ललिता जैसी सखी। मैं रुक्मिणी नहीं, बल्कि मीरा का विरह, राधा का अनन्य प्रेम और ब्रज की होली का उल्लास जीना चाहती हूँ।कृष्ण बनना सरल नहीं, पर उनके प्रेम में खो जाना—यही सबसे बड़ा सुख है।

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गढ़ देवी माई: आस्था और कृपा का अनुभव

मेरे मायके के निकट मढ़ौरा (सारण) में गढ़ देवी माई का प्राचीन मंदिर है, जो अपनी कृपा और सबकी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए प्रसिद्ध है। वर्षों से उनके दर्शन की लालसा लिए मैं अवसर की तलाश में थी। आखिरकार, माता रानी ने मेरी प्रार्थना सुन ली और मैं अपने मंझले भैया के साथ गांव पहुंची।

वर्षों बाद अपने बाल्यकाल की धरती पर लौटना, पुराने संगी-साथियों और घर की यादों से मिलना अत्यंत सुखद था। दिसम्बर की ठंडी सुबह, घने कोहरे के बीच हम गढ़ देवी माई के दर्शन के लिए मंदिर पहुँचे। मां का अद्भुत सौंदर्य देखते ही मैं अभिभूत होकर भावुक हो उठी। माता ने अपने स्नेह और आशीर्वाद से हमें भर दिया—सपरिवार सुख और समृद्धि का आशीष।

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नवदुर्गा के प्रेरक दोहे

नवरात्रि का पर्व शक्ति और भक्ति का अद्वितीय संगम है। इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। पहले दिन शैलपुत्री का सुंदर दरबार सजता है, जिनकी आराधना से जीवन में ममता और वात्सल्य का संचार होता है। दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी का स्मरण किया जाता है, जो तप, साधना और भक्ति की प्रतीक हैं।

माँ चंद्रघंटा अपने अपार सौंदर्य और दिव्य छवि के साथ पीले वस्त्र धारण कर सिंह पर सवार होकर भक्तों को संकटों से मुक्त करती हैं। कूष्मांडा स्वरूप धारण करने वाली माँ के ध्यान से शोक, भय और अशुभता दूर होकर शुभ वरदान मिलता है। पंचम रूप में माँ स्कंदमाता के दर्शन से अद्भुत शांति और कृपा प्राप्त होती है।

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कहाँ गए वो लोग

पुराने समय में लोग आपसी मान-सम्मान और पश्चाताप की भावना से भरे रहते थे। जब भी बात मान की आ जाती, तो वे तुरंत झुक जाते और मेल कर लेते। भाई आपस में चाहे कितना भी झगड़ लेते, लेकिन मातृ प्रेम के कारण तुरत ही एक हो जाते और थोड़ी देर रूठकर वापस घर लौट आते।

उस दौर में यदि पड़ोस की दीवारें भी खड़ी हो जातीं, तो लोग उचक-उचक कर झांकते और चूल्हा जलता देखकर आग मांग लेते। गलती हो जाने पर दिन-रात प्रायश्चित करके खुद को सुधारने का प्रयास करते। काली रातों में जब गीदड़ गुर्राते और कोई हल्की सी आवाज़ भी आती, तो गाँव के लोग तुरंत चौकन्ने होकर प्रहरी बन जाते।

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छोटी मदद, बड़ा असर

मॉल में आम दिन जैसा लग रहा था, लेकिन 4 साल की आन्या ने दिखा दिया कि छोटी-सी मदद भी बड़ा असर डाल सकती है। अपने बलून और कपकेक्स का पैकेट लिए वह मुस्कुराते हुए उस बच्ची को दे देती है, जिसे कोई नहीं देख रहा था। माता-पिता की नजरों के सामने यह नन्हीं सी मानवता का सबक, उनके दिलों को छू जाता है और समाज में मदद और दयालुता का संदेश फैलाता है।

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पत्रकारिता को धर्म की तरह धारण करने वाले पत्रकार दिनेशचंद्र वर्मा

स्वर्गीय दिनेश चंद्र वर्मा ने पत्रकारिता को सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि धर्म की तरह जिया। उनके लेख, विद्वत्ता और नैतिकता ने स्वतंत्र पत्रकारिता का आदर्श स्थापित किया। उनके व्यापक ज्ञान, गहरी समझ और अखबारों में लगातार प्रकाशित लेख उन्हें पत्रकारिता और साहित्य जगत में अनमोल बना देते हैं।”

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“अस्तित्व”

“दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों की राहों में भी, छोटे-छोटे क्षण और यादें हमारे अस्तित्व को जीने का साहस और संबल देती हैं। गुप्तधन जैसे नन्हा दीपक, उड़ते पंछी, यादों की कुप्पी—ये सब हमें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों और अपने अस्तित्व के साथ जुड़ने का अनुभव कराते हैं।

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खुशी…

“हमारी खुशी में सबसे बड़ी बाधा हम खुद बनते हैं। नकारात्मक विचार और माहौल हमें एंग्जायटी में डाल सकते हैं। इसलिए अपनी दिनचर्या में हल्की फेरबदल करें, अपनी हॉबी और दूसरों के लिए समय निकालें, और परोपकार को अपनाएँ—क्योंकि दूसरों की मदद करना, हमारी आत्मशुद्धि का सबसे बड़ा मार्ग है।”

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बरसात, भक्ति और मेला

“बरसात से लबालब भरे गाँव का दृश्य। चारों ओर पानी ही पानी, ताल-तलैया और खेतों में भरे जल के बीच पगडंडी डूबी हुई है। कुछ ग्रामीण घुटनों तक कपड़ा उठाए, हाथ में चप्पल पकड़े सावधानी से रास्ता पार कर रहे हैं। बच्चे किनारे पर खड़े हँसते-खिलखिलाते तालियाँ बजा रहे हैं। दूर खुले-खुले पैतृक घर और हरसिंगार का पेड़ दिख रहा है, जिसकी झरती कलियाँ पूजा के लिए टोकरी में भरी जा रही हैं। पृष्ठभूमि में गाँव का दुर्गा पूजा पंडाल, मिट्टी की प्रतिमा, जलते दीपक और ढाक-वादन से गूँजता भक्तिमय वातावरण दिखाई दे रहा है।”

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