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जब तक शिष्टाचार जीवित, समाज भी जीवित

Give and Take की थ्योरी एक सरल लेकिन गहराई से भरी जीवन-दृष्टि है, जो न सिर्फ हमारे व्यक्तिगत संबंधों को परिभाषित करती है, बल्कि हमारे सामाजिक और पेशेवर जीवन में भी अहम भूमिका निभाती है। फिर चाहे वह मान – सम्मान,स्नेह हो या नफ़रत …..।
वैसे तो आज के समय में यदि हम अपने चारों ओर नज़र डालें, तो एक स्पष्ट और चिंताजनक परिवर्तन दिखाई देता है — शिष्टाचार की कमी। वह विनम्रता, वह ‘कृपया’, ‘धन्यवाद’, और ‘माफ कीजिए’ जैसे शब्द अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। एक समय था जब बड़ों का सम्मान, छोटों पर स्नेह, और अजनबियों के प्रति भी आदर का भाव समाज की आत्मा हुआ करता था।

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अमरनाथ यात्राः जहां सांस लेता है शिव

केदारनाथ यात्रा के बाद आत्मा जैसे हिमालय की ओर फिर खिंच गई थी। 9 जुलाई 2024 को नागदा से शुरू हुई हमारी अमरनाथ यात्रा भक्ति, रोमांच और व्यवस्था से भरी रही। जम्मू के भगवती नगर बेस कैंप तक का सफर, यात्रा कार्ड बनवाने की प्रक्रिया और सेवाभाव से परिपूर्ण भंडारे—हर क्षण अविस्मरणीय अनुभव बन गया।

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अकेला तन, भरा मन…

“24 सितंबर 2023 की एक आध्यात्मिक संध्या में, महिदपुर के गंगावाड़ी में संकीर्तन के दौरान भगवान की प्रेरणा से गोवर्धन की दंडवत परिक्रमा का विचार जागा। बिना किसी योजना और साथी के, केवल श्रद्धा और ईश्वर के भरोसे पर यह यात्रा शुरू हुई। मथुरा, यमुना स्नान, मुखारविंद दर्शन और तपस्वियों की प्रेरणा से भरपूर यह अनुभव, तन को थका कर भी आत्मा को जाग्रत कर गया। गिरिराज महाराज की कृपा से यह यात्रा एक भक्ति, साहस और समर्पण की जीवंत कथा बन गई।”

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मुंबई का बच्चा : इंदौर

इंदौर को मुंबई का बच्चा क्यों कहा जाता है, सवाल कई लोगों के मन में होगा। जवाब यही है कि जैसे बच्चा अपने पिता की रेप्लिका होता है , वैसे हो इंदौर मुंबई की रेप्लिका ही है। वैसा ही उद्यमी स्वभाव, कॉस्मोपोलिटन जीवन, आधुनिकता और पुरातन का सम्मिश्रण, 24 घंटे जागने वाला, नई तकनीकों और विचारों स्वागत करता हुआ मराठी भाषियों का प्रिय शहर ! यहां मराठीभाषियों का वर्चस्व इसलिए रहा कि महाराष्ट्र से नज़दीकी है और यहाँ के शासकों मराठी भाषी रहे हैं।

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कट चाय से कलम तक

“फटी सी कमीज़, नेकर, एक हाथ में चाय की केतली और दूसरे में कप… सीतलामाता बाज़ार के मजदूर चौक पर आवाज़ गूंजती—‘ए छोटू, दो कट भर दे!’ बचपन की वो सुबहें, जब पचास पैसे रोज़ की मजदूरी के लिए चाय बनाना, दुकान-दुकान चाय पहुंचाना और फिर स्कूल भागना… आज भी जब खुद के लिए चाय बनाता हूं, वो छोटू मुझमें अब भी ज़िंदा लगता है।”

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सम्मान की सूखी रोटी

मैंने तुम्हारी बातों में आकर अपना परिवार छोड़ दिया और तुमने मुझे धोखा दिया,” प्रियांशी के स्वर में टूटे हुए सपनों की गूंज थी। लेकिन जवाब में जो मिला, वो और भी ज़्यादा चुभने वाला था – “तुम जैसी औरतों की कोई इज्जत नहीं…”

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प्रयागराज: जहाँ जल भी मोक्ष का द्वार बनता है

प्रयागराज—तीर्थों का राजा, जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का त्रिवेणी संगम आत्मा को छू लेने वाला अनुभव बन जाता है। यह केवल नदियों का मिलन नहीं, श्रद्धा और सनातन परंपरा की धारा है। संगम में एक डुबकी, जीवन के सभी द्वंद्वों से मुक्ति और शांति का मार्ग प्रशस्त करती है। नाव की धीमी चाल, मंत्रों की गूंज और जल पर तैरते दीप—यह एक ऐसी यात्रा है, जो हृदय को भीतर तक शांत कर देती है।

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साक्षी

एक स्वप्न, जो केवल देखा नहीं जाता — बल्कि देखा जाता है, उसे देखते हुए। यह कविता दृष्टि, अनुभूति और अस्तित्व की उस हल्की परत को छूती है जहाँ देखने और देखे जाने की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं।

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“आसान हो जाए सफ़र”

मेरी क़िस्मत में तेरा साथ अगर हो जाएज़िंदग़ी का मेरा आसान सफ़र हो जाएऔर कुछ भी नहीं ख़्वाहिश मेरी अब इसके सिवामेरे महबूब की बस मुझ पे नज़र हो जाए.

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प्रेम की छोटी सी सल्तनत

एक छोटी-सी सल्तनत, कुछ किताबें, एक बिस्तर और दो दिल—इस कहानी में प्रेम के वे पल कैद हैं जो हँसी और आँसुओं के बीच कहीं मुकम्मल होते हैं। कभी झिझक, कभी झेंप, और एक आलिंगन—जो बरसों बाद भी उतना ही सुकून देता है जितना पहली बार।

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