मेरे पापा – मेरी ताक़त”

“जब दुनिया ने मुँह मोड़ा, राहें सब सूनी थीं,
पापा के आँगन में उम्मीदें बस जीती थीं।
हर हार में उन्होंने मुझे मुस्कराना सिखाया,
हर गिरने पर खुद उठकर चलना सिखाया।
पापा — आप मेरे भगवान हैं इस ज़मीं पर,
आपके बिना ये जीवन अधूरा सा है हर पल।”

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जीरो पॉइंट तक का बर्फीला रोमांच

सवेरे-सवेरे हम श्रीनगर से सोनमर्ग के लिए निकले, लेकिन हमें यह अंदाज़ा नहीं था कि असली रोमांच तो सोनमर्ग के आगे शुरू होगा — जब हम 11600 फीट की ऊंचाई पर स्थित जीरो पॉइंट की ओर बढ़े। हरियाली भरे सोनमर्ग से लेकर बर्फीले ज़ोजिला दर्रे तक का यह सफर एक ओर प्रकृति की अद्भुत सुंदरता दिखाता है तो दूसरी ओर मानव की साहसिक सीमाओं को छूता है। ज़ोजिला टनल का निर्माण इस दुर्गम क्षेत्र में इंजीनियरिंग की एक मिसाल है। प्रकृति की यह बर्फीली गोद हमें सिखाती है कि जीवन छोटा है, इसलिए इसे प्यार और अपनों के साथ भरपूर जिया जाए।

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खेत में मेहनत करती माँ और उसके साथ खड़ा बच्चा, जो गरीबी और शिक्षा के संघर्ष को दर्शाता है

ये कैसा सवाल

गरीबी और मजबूरी के बीच पला-बढ़ा एक छोटा सा बच्चा, जब जीवन की सच्चाई को करीब से देखता है, तो उसके भीतर एक बड़ा बदलाव जन्म लेता है। यह कहानी आठ वर्षीय भानु और उसकी मजदूर माँ रमिया की है, जो रोज़मर्रा की कठिनाइयों के बीच भी अपने बेटे के बेहतर भविष्य का सपना देखती है।

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हाउस बोट में एक रात

यदि श्रीनगर में डल झील न होती तो शायद श्रीनगर की पहचान ही अधूरी रह जाती। ये झील न केवल कश्मीर की रूह है, बल्कि यहाँ की हाउस बोट और शिकारा सैर यात्रियों को एक अनोखा अनुभव देती है। लकड़ी की नक्काशीदार हाउस बोट, झील में तैरता मीना-बाजार, और शिकारे से होता हुआ रोमांचकारी सफर — यह सब मिलकर डल झील को स्वर्ग बनाते हैं।”

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डिब्बे वाले

“सब की भूख का हिसाब रखने वाले, अपनी भूख को कैसे दबा कर रख पाते होंगे?”
यह पंक्ति डिब्बे वालों के जीवन की मार्मिक विडंबना को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है — वे जो दूसरों की भूख मिटाते थे, स्वयं भूखे रह गए।

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जो दिखता है, वह पूरा नहीं स्त्री जीवन के अनकहे अध्याय

शीशमहल” हो या “अंतिम प्रश्न”, कविता वर्मा की कहानियाँ उस स्त्री की कथा कहती हैं जो ना केवल अपनी भूमिका से बंधी है, बल्कि अपनी पहचान के लिए छटपटाती भी है। ये कहानियाँ घर के भीतर की उन संकरी गलीयों की पड़ताल करती हैं, जहाँ स्त्री होना एक उत्तरदायित्व नहीं, एक दंड जैसा महसूस होता है। लेखिका का दृष्टिकोण कहीं भी रोमैंटिक नहीं होता, बल्कि बेहद यथार्थपरक और भीतर तक धँसता हुआ है। स्त्री को सहानुभूति नहीं, समझ की ज़रूरत है — यही संदेश इन कहानियों की अंतर्धारा है।”

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गाँव के आँगन में अपनी छोटी भांजी के साथ बैठा एक स्नेही मामा, उसे कलम बनाना सिखाते हुए, ग्रामीण परिवेश में प्रेम, सुरक्षा और बचपन की यादों से भरा भावनात्मक दृश्य।

बेचन मामा

मुन्नी शायद पाँच साल की थी जब पहली बार उसे मामा के घर भेजा गया। बचपन से ही माता-पिता से दूर रहकर उसने बड़े लोगों के साए में अपना जीवन काटा — कभी बड़ी अम्मा के यहाँ, तो कभी बुआ के पास। पर मुन्नी के जीवन में सबसे कोमल, सबसे निर्मल प्रेम अगर किसी ने उसे दिया तो वो थे बेचन मामा। बेचन मामा के घर में मुन्नी ने पहली बार वो स्नेह पाया जो शायद एक बच्चा माँ-बाप से चाहता है। उनके साथ वह खेलती, रूठती, मनाती और उनके साये में हर डर भूल जाती।

बेचन मामा के बनाए कंडों की कलमों से लिखते हुए उसकी पटरी सबसे चमकती थी, और मामा की सिखाई हुई सुंदर लिखावट में उसका नाम लिखा जाता था। समय के साथ मुन्नी ने जाना कि बचपन में जो छाया उसे मिली, वह सामान्य नहीं थी — वह तो प्रेम की पराकाष्ठा थी, जो हर किसी के हिस्से में कहाँ आती है।

पन्द्रह साल बाद जब वह फिर मामा के घर लौटी, तो उसकी आँखें नम थीं, लेकिन दिल भरा हुआ — मामा की वही मुस्कान, वही स्नेह और वही अपनापन देखकर। उसने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की — “हे ईश्वर, हर बच्ची को एक बेचन मामा जरूर मिले

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छोटी कहानियों में बड़े अर्थ

रश्मि चौधरी का लघुकथा संग्रह ‘संवेदनाओं का स्पर्श’ समकालीन हिंदी लघुकथा को एक नई चेतस दिशा प्रदान करता है। ये लघुकथाएं केवल आक्रोश, टकराव या विरोध का आख्यान नहीं हैं, बल्कि इनमें मानवीय सहकार, संवेदनात्मक विस्तार और यथार्थ का सधा हुआ समन्वय देखने को मिलता है। संग्रह की रचनाएं जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को बड़ी आत्मीयता और वैचारिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। कभी मनोविज्ञान की परतें खुलती हैं, तो कभी समाजशास्त्रीय संदर्भों का मूक आकलन होता है। ‘दुकानदारी’, ‘अन डू’, ‘सम्मान’, ‘मान्यताएं’ जैसी लघुकथाएं अपनी गहनता और प्रतीकों के माध्यम से पाठक के मन को छू जाती हैं। लेखिका की भाषा-संरचना और कथ्य विन्यास लघुकथा को संवेदना की ऐसी धरती पर स्थापित करते हैं, जहाँ विचार और अनुभूति दोनों का संतुलन है।”

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आस्था में विश्‍वास

भारत की आध्यात्मिक परंपराएं समय के साथ बदलती जरूर रही हैं, पर उनकी आत्मा आज भी उतनी ही जीवंत और शक्तिशाली है। इसका प्रमाण राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटू श्याम मंदिर है, जो केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि विश्वास, समर्पण और भक्ति का जीवंत केन्द्र बन चुका है। विशेषकर निर्जला एकादशी और द्वादशी के पावन पर्व पर यहां आस्था का ऐसा महासंगम होता है, जो किसी भी श्रद्धालु के हृदय को अद्वितीय शांति और ऊर्जा से भर देता है।

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पोहे : स्वाद, परंपरा और देसी दिलों का मिलन

पोहे तो पोहे हैं — एक ऐसा देसी नाश्ता जो न केवल पेट भरता है, बल्कि दिल भी जीत लेता है। खासकर जब बात हो मराठी कांदा-बटाटे पोहे की, तो फिर स्वाद की बात ही कुछ और होती है। राई, कड़ी पत्ता, प्याज, मूंगफली, नींबू और ऊपर से नारियल की सजावट — हर कौर में बस आनंद ही आनंद। चाहे दडपे पोहे हों या मिसळ पोहे, एक्सपेरिमेंट भले होते रहें, पर असली प्रेम तो उसी ऑथेंटिक स्वाद से है। मराठी शादियों में भी पोहे-चाय की रस्म दिलों को जोड़ने का माध्यम बनती है। आज का दिन कुछ देसी हो जाए

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