कौन हो तुम ?
“कौन हो तुम?” एक ऐसी भावपूर्ण कविता है, जिसमें प्रेम, विरह, प्रतीक्षा और आत्मिक जुड़ाव की अनुभूतियाँ शब्दों के माध्यम से जीवंत हो उठती हैं।

“कौन हो तुम?” एक ऐसी भावपूर्ण कविता है, जिसमें प्रेम, विरह, प्रतीक्षा और आत्मिक जुड़ाव की अनुभूतियाँ शब्दों के माध्यम से जीवंत हो उठती हैं।
जमशेदपुर के विजया गार्डन में सावन महोत्सव के दौरान महिलाओं ने गीत-संगीत, नृत्य और रंग-बिरंगे परिधानों के साथ जमकर उत्सव मनाया। पूर्णिमा साहू की मौजूदगी ने कार्यक्रम की रौनक बढ़ाई।
मनुष्य रूप में प्रभु श्रीराम का अवतार मर्यादा, त्याग और संघर्ष का अद्भुत संदेश देता है। प्रस्तुत कविता उसी दिव्य स्वरूप को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है।
ऐ ज़िंदगी… कभी ममतामयी माँ बनकर लाड़ लड़ाती है, तो कभी पिता बन संघर्षों से लड़ना सिखाती है। कभी खुशियों की चाशनी में डुबोती है, तो कभी ग़मों के काँटे चुभाती है। लेकिन अब समझ आया—तेरी हर शरारत के पीछे कोई न कोई सबक़ छिपा होता है।
कुछ रिश्तों में प्यार के साथ नोकझोंक, शरारत और हँसी भी घुली होती है। अर्णव और मायरा की यह कहानी बताती है कि कभी-कभी एक-दूसरे को परेशान करना भी प्यार जताने का खूबसूरत तरीका होता है।
सावन की फुहारों के साथ सुमन को अपने मायके और माँ की याद सताने लगती है। राखी, फेनी और घेवर से जुड़ी छोटी-सी याद उसे उन रिश्तों तक ले जाती है, जो अब उसके जीवन में नहीं हैं।
प्रेम जब विश्वास मांगता है और रिश्ते परीक्षा लेने लगते हैं, तब सिया के मन में राम से कई अनकहे सवाल जन्म लेते हैं। यह कविता उसी प्रेम, पीड़ा, विरह और स्त्री के आत्मसम्मान की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
तीन दशक पहले मिली एक आदिवासी लड़की मीरा, जो पढ़ाई में बेहद होशियार थी और जीवन में आगे बढ़ना चाहती थी। लेकिन परिस्थितियों ने उसकी राह रोक दी। वर्षों बाद हुई एक मुलाकात ने दोस्ती, सपनों और बिछड़ने की ऐसी कहानी छोड़ दी, जिसका सवाल आज भी कायम है मीरा तुम कहाँ हो?