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मैं सिया सी… और तुम राम

सीता और राम के प्रेम, विरह और भावनात्मक संघर्ष को दर्शाती यथार्थवादी साहित्यिक छवि

नीरु जैन, जयपुर

सुनो…

इक बनवास भोगा था तुम संग,
लक्ष्मण को राजपाट सौंप,
दूसरे बनवास में
तुम मेरे संग आ भी सकते थे…

हनुमान को सुध लेने भेजा,
पर इक बार भी
खुद न आ सके तुम,
इतना तुम कैसे पथरा सके थे…?

इक लांछन लगाया था धोबी ने मुझ पर,
मुझ पर यक़ीन होता अगर,
तुम उसे मिटा भी सकते थे…

जो प्रेम-प्रीत अपनी थी सच्ची,
तुम हर अग्नि-परीक्षा में
मेरा हाथ थामकर,
सात फेरों के वचन
निभा भी सकते थे…

तुम तो कहते थे—
“जी ना सकोगे मुझ बिन…”

तो फिर जब धरती फटी,
तुम मेरा हाथ थामकर
मेरे संग
धरती में समा भी सकते थे…

बोलो राम,
ये कैसी प्रीत थी तुम्हारी…?

मैं सिया सी
तुम्हें प्रेम करती रही,
और तुम राम होकर भी
मेरे प्रेम की
परीक्षा लेते रहे…

5 thoughts on “मैं सिया सी… और तुम राम

  1. लाजवाब सृजन वाह 👌👌

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