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विरासत में मिली करुणा, कर्म में उतरी सेवा

“सेवा का भाव मेरे लिए कोई काम नहीं, जीवन का उद्देश्य है।”ये शब्द उस संवेदनशील समाजसेवी के हैं जिन्होंने कोरोना काल से लेकर आज तक मूक पशुओं, पक्षियों, जरूरतमंदों और असहायों के लिए अथक सेवा की है। चाहे पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था हो, गौशाला में चारे की सेवा या फिर बेड रिडन मरीजों के लिए निःशुल्क उपकरण हर कार्य में करुणा, प्रतिबद्धता और पारिवारिक संस्कारों की झलक मिलती है।

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बच्चों को खुद चुनने दीजिए उनका सुर

एक पिता ने अपने बेटे को ज़बरदस्ती शास्त्रीय संगीत की कक्षा में भेज दिया, जबकि बच्चे को संगीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी। यह लेख बताता है कि कैसे माता-पिता अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर थोपते हैं और क्यों यह ज़रूरी है कि हर व्यक्ति—चाहे किसी भी उम्र का हो—अपने ही सपनों को पूरा करने का प्रयास करे। बच्चों को उनकी पसंद का रास्ता चुनने देना ही सच्ची परवरिश है।

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“बृज की रज, रबड़ी और राधा

गोवर्धन की परिक्रमा कोई साधारण यात्रा नहीं, यह आत्मा की तपस्या है। 27 से 30 सितंबर तक की इस दंडवती परिक्रमा में मैंने न केवल शरीर को बल्कि हृदय को भी बृजरज में लोटते पाया। हर कदम, हर प्रणाम में बृज का माधुर्य, भक्ति की ऊष्मा और सेवा का भाव समाया था। भक्तों का प्रेम, रास्ते के भंडारे, बुजुर्गों की प्रेरणा और मित्र का साथ — सबने मिलकर यह यात्रा एक दिव्य अनुभव बना दी। राधा कुंड में स्नान से लेकर कुसुम सरोवर की विद्युत छटा तक, हर पड़ाव ने मुझे भीतर तक छू लिया। यह यात्रा थी—तन की थकान को तज कर मन की शांति पाने की।

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जब तक शिष्टाचार जीवित, समाज भी जीवित

Give and Take की थ्योरी एक सरल लेकिन गहराई से भरी जीवन-दृष्टि है, जो न सिर्फ हमारे व्यक्तिगत संबंधों को परिभाषित करती है, बल्कि हमारे सामाजिक और पेशेवर जीवन में भी अहम भूमिका निभाती है। फिर चाहे वह मान – सम्मान,स्नेह हो या नफ़रत …..।
वैसे तो आज के समय में यदि हम अपने चारों ओर नज़र डालें, तो एक स्पष्ट और चिंताजनक परिवर्तन दिखाई देता है — शिष्टाचार की कमी। वह विनम्रता, वह ‘कृपया’, ‘धन्यवाद’, और ‘माफ कीजिए’ जैसे शब्द अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। एक समय था जब बड़ों का सम्मान, छोटों पर स्नेह, और अजनबियों के प्रति भी आदर का भाव समाज की आत्मा हुआ करता था।

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अमरनाथ यात्राः जहां सांस लेता है शिव

केदारनाथ यात्रा के बाद आत्मा जैसे हिमालय की ओर फिर खिंच गई थी। 9 जुलाई 2024 को नागदा से शुरू हुई हमारी अमरनाथ यात्रा भक्ति, रोमांच और व्यवस्था से भरी रही। जम्मू के भगवती नगर बेस कैंप तक का सफर, यात्रा कार्ड बनवाने की प्रक्रिया और सेवाभाव से परिपूर्ण भंडारे—हर क्षण अविस्मरणीय अनुभव बन गया।

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अकेला तन, भरा मन…

“24 सितंबर 2023 की एक आध्यात्मिक संध्या में, महिदपुर के गंगावाड़ी में संकीर्तन के दौरान भगवान की प्रेरणा से गोवर्धन की दंडवत परिक्रमा का विचार जागा। बिना किसी योजना और साथी के, केवल श्रद्धा और ईश्वर के भरोसे पर यह यात्रा शुरू हुई। मथुरा, यमुना स्नान, मुखारविंद दर्शन और तपस्वियों की प्रेरणा से भरपूर यह अनुभव, तन को थका कर भी आत्मा को जाग्रत कर गया। गिरिराज महाराज की कृपा से यह यात्रा एक भक्ति, साहस और समर्पण की जीवंत कथा बन गई।”

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मुंबई का बच्चा : इंदौर

इंदौर को मुंबई का बच्चा क्यों कहा जाता है, सवाल कई लोगों के मन में होगा। जवाब यही है कि जैसे बच्चा अपने पिता की रेप्लिका होता है , वैसे हो इंदौर मुंबई की रेप्लिका ही है। वैसा ही उद्यमी स्वभाव, कॉस्मोपोलिटन जीवन, आधुनिकता और पुरातन का सम्मिश्रण, 24 घंटे जागने वाला, नई तकनीकों और विचारों स्वागत करता हुआ मराठी भाषियों का प्रिय शहर ! यहां मराठीभाषियों का वर्चस्व इसलिए रहा कि महाराष्ट्र से नज़दीकी है और यहाँ के शासकों मराठी भाषी रहे हैं।

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कट चाय से कलम तक

“फटी सी कमीज़, नेकर, एक हाथ में चाय की केतली और दूसरे में कप… सीतलामाता बाज़ार के मजदूर चौक पर आवाज़ गूंजती—‘ए छोटू, दो कट भर दे!’ बचपन की वो सुबहें, जब पचास पैसे रोज़ की मजदूरी के लिए चाय बनाना, दुकान-दुकान चाय पहुंचाना और फिर स्कूल भागना… आज भी जब खुद के लिए चाय बनाता हूं, वो छोटू मुझमें अब भी ज़िंदा लगता है।”

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सम्मान की सूखी रोटी

मैंने तुम्हारी बातों में आकर अपना परिवार छोड़ दिया और तुमने मुझे धोखा दिया,” प्रियांशी के स्वर में टूटे हुए सपनों की गूंज थी। लेकिन जवाब में जो मिला, वो और भी ज़्यादा चुभने वाला था – “तुम जैसी औरतों की कोई इज्जत नहीं…”

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प्रयागराज: जहाँ जल भी मोक्ष का द्वार बनता है

प्रयागराज—तीर्थों का राजा, जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का त्रिवेणी संगम आत्मा को छू लेने वाला अनुभव बन जाता है। यह केवल नदियों का मिलन नहीं, श्रद्धा और सनातन परंपरा की धारा है। संगम में एक डुबकी, जीवन के सभी द्वंद्वों से मुक्ति और शांति का मार्ग प्रशस्त करती है। नाव की धीमी चाल, मंत्रों की गूंज और जल पर तैरते दीप—यह एक ऐसी यात्रा है, जो हृदय को भीतर तक शांत कर देती है।

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