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आन है हिंदी

हिंदी हमारी मातृभाषा ही नहीं, बल्कि देश का सम्मान और अभिमान है। इसमें प्रेम बसता है, स्वरों की मधुर तान गूंजती है और हर शब्द अपनी सरस लय से हृदय को छू लेता है। यह हमारी सभ्यता और सरल आचरण की पहचान है, जो चरित्र को निखारती और राष्ट्र की शान को बढ़ाती है। हिंदी के बिना ज्ञान अधूरा है, इसलिए इसे सदा सर्वोपरि रखना ही हमारा कर्तव्य है।

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एक साल के बच्चे ने खेल-खेल में कोबरा को काटा

बिहार के बेतिया में एक साल के मासूम ने खेल-खेल में कोबरा को काट डाला। सांप की मौत हो गई, लेकिन बच्चा सुरक्षित है और इलाज के बाद खतरे से बाहर बताया जा रहा है।

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मखाना: सेहत का साथी या नुकसान का कारण?

कभी सिर्फ व्रत के खाने तक सीमित मखाना आज हेल्थ-फ्रीक लोगों की थाली में जगह बना चुका है। लो-कैलोरी और हाई-फाइबर स्नैक होने के कारण इसे सुपरफूड कहा जा रहा है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, मखाना वजन घटाने, शुगर कंट्रोल और हार्ट हेल्थ के लिए फायदेमंद है।

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त्योहारों में मध्य रेल चलाएगा 1126 विशेष ट्रेनें

त्योहारों के मौसम में यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मध्य रेल ने बड़ी घोषणा की है। इस बार पूजा, दिवाली और छठ पर्व के लिए कुल 1126 विशेष ट्रेनें चलाई जाएँगी। इनमें से 182 नई विशेष ट्रेनें  अभी घोषित की गई हैं, जबकि 944 ट्रेनें पहले ही घोषित हो चुकी हैं। रेलवे प्रशासन का कहना है कि नई ट्रेनों से मुंबई, पुणे और अन्य शहरों से बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना जाने वाले यात्रियों को सीधी सुविधा मिलेगी।

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नैनो बनाना ट्रेंड: सोशल मीडिया पर 3D फिगर बनाने की नई लहर

सुरेश परिहार, लाइव वायर न्यूज, पुणे सोशल मीडिया पर एक नया क्रेज़ छा गया है, जिसे लोग नैनो बनाना के नाम से जानते हैं. इस ट्रेंड में तस्वीरों को कुछ ही सेकंड में 3D डिजिटल फिगर में बदल दिया जाता है. गूगल के नवीनतम टूल, 2.5, की मदद से लोग अपनी, अपने दोस्तों, पालतू जानवरों…

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क्यों है?

राह में काँटों का मंजर बिखरा पड़ा है, फिर भी दिल फूलों की ओर आकृष्ट होता है। दामन भले ही बेवफाई की कहानियों से भरा हो, फिर भी वफ़ाओं पर भरोसा कायम रहता है। उसकी पल-पल रूठने की आदत है, लेकिन नाज़-नखरों को उठाने में वह पीछे नहीं हटता। आँधी और तूफ़ान उसे रोक नहीं पाएंगे, फिर भी यह बात दिल को गर्वित करती है। हरी-भरी वादियों पर उसने लाल रंग डाला, और इसके बावजूद उसे क्षमा किया जाता है। समुंदर की गहराई नापने की कला है उसमें, फिर भी गोता लगाने से डरता है। रोज़-रोज़ बदलता चेहरा देखकर आइना भी हैरान रह जाता है।

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मेरी यायावरी!

मेरी यायावरी ने मुझे एक अनवरत पथगामी बना दिया है, जैसे मैं इस धरा पर रहते हुए भी व्योम का वासी बन गया हूँ। मन को पल भर का चैन नहीं मिलता। स्मृतियों का इतिहास वह निरंतर रचता रहता है और क्षणभंगुर जीवन में नए-नए आकाश गढ़ता रहता है।

कभी यह मन वृक्ष की ऊँची फुनगी पर जा बैठता है, मधुर राग बनकर इतराता है। अगले ही पल जब तेज़ हवा का झोंका आता है तो तंद्रा भंग हो जाती है और यह यथार्थ की ज़मीन पर धड़ाम से गिर पड़ता है।

हर क्षण एक मृदुल तरंग उठती है। शब्दों के घाट पर नंगे पाँव घूमती भावनाएँ अकुलाई-सी मोती चुनती रहती हैं। उन्हीं मोतियों से स्वर्णिम अभिव्यक्तियाँ जन्म लेती हैं और तभी एक नया काव्य आकार पाता है

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मौन रात्रि और स्वप्निल वेदना

अँखियाँ रात भर प्रेमिल स्वप्नों में जागती रहीं और रात भोर की प्रतीक्षा में ठहरी रही। मौन ओढ़े मानिनी-सी पीड़ा सहती रही, मगर अपनी वेदनाएँ किसी से न कह सकी और गरल पीकर भी चुप रही। भावनाओं के पारिजात बिखेरकर, श्वेत वस्त्रों में सजी वह सुरभित यामिनी को पीछे छोड़ चली गई।

श्यामल मेघों से घिरी रात में दीपशिखा मद्धम पड़ गई और अमावस की निस्तब्धता में झरती रही चाँदनी। उसके अंतर्मन की कोमलता ओस की बूँदों-सी पारदर्शी थी। वही मधुरिमा उसकी लेखनी से बही और हृदय के फूलों-सी कोमल पंक्तियों में खिल उठी।

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इस बार मैं चुप रहूंगी

उस दिन एक स्पर्श हवा में ठहर-सा गया था, ठीक उसी क्षण जब शब्दों ने जन्म लेना ही चाहा था। तुम्हारी बात सिर्फ मेरे कानों तक नहीं पहुँची, वह सीधे भीतर तक उतर आई थी। मगर भाषा की गलियाँ उन दिनों बहुत संकरी थीं। खिड़की आधी ही खुली थी और बादलों ने कोई वादा नहीं किया था—न थमने का, न बरसने का।

स्मृति आज भी वहीं अटकी है, जहाँ तुमने मुझे बिना कुछ कहे देखा था। उस शाम समय बहुत तेज़ी से गुज़र गया था, या शायद वह ऊबकर किनारे खड़ा रह गया था। मुझे लगा था कि तुम कुछ कहना चाहते हो, और मैं अपनी घबराहट में, कुछ न कहकर भी सब कुछ कह चुकी थी। अब अगर तुम फिर से मिलो, तो मैं इस बार चुप रहूँगी। कुछ नहीं कहूँगी—बस तुम्हें लिख दूँगी। और अगर हो सके, तो तुम बस पढ़ लेना।

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उम्मीदों की खिड़की से

ज़िंदगी में कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएँ, उम्मीदों की खिड़की हमेशा खुली रहनी चाहिए। दुनिया कुछ भी कहे, लेकिन अपने हौसले को मज़बूत बनाए रखना ज़रूरी है। आंधियाँ आएँ तो भी दिल का दिया जलता रहना चाहिए। इंसान को पत्थर नहीं बनना है, बल्कि टूटकर और तराशकर अपने आप को बेहतर बनाना है। इम्तिहान तो जीवन में बार-बार आएँगे, लेकिन हर बार हमें अपने लक्ष्य पर टिके रहना है। यही उम्मीद और यही हौसला हमें आगे बढ़ने की ताकत देते हैं।

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