एक खत देवांश के नाम

अपने पति के नाम दर्द और अधूरे प्रेम से भरा पत्र लिखती एक भारतीय स्त्री का भावुक दृश्य

डॉ. रत्ना मानिक, प्रसिद्ध लेखिका, टेल्को (जमशेदपुर)

मेरे प्यारे देव,
क्या यहां बहुत सारा स्नेह लिखूं…? क्योंकि मेरे स्नेह की तो तुमने कोई कद्र कभी की नहीं। जानते हो देव! मैं अपने घर की सबसे लाड़ली बिटिया थी…नहीं…नहीं…मेरे पिता के शब्दों में “मैं उनका बिज्जू बेटा थी” (बिज्जू, आम का एक प्रकार जिसे मैं बहुत खाती थी) पिता के अतिशय दुलार की वजह से मैं थोड़ी टॉम बॉय किस्म की लड़की थी । दोनों हाथों को दोनों तरफ तेजी से भाजते हुए चलना, पापा के न रहने पर उनकी दुकान संभालना,उनके मित्रों के साथ दो चार बातें बतिया लेना,एक बरफ गोला के लिए पापा के पैर दबाना…थोड़ी अल्हड़…थोड़ी बिंदास…ये थी मैं…यानि मृणाली ।

याद है देव! मैं विवाह के बाद जब तुम्हारे घर यानि अपनी ससुराल आई थी तो सभी महिलाएं रात के खाने के लिए एक साथ बैठी थीं पर मैं खाना नहीं खा रही थी। जेठानी ने जब पूछा तो मुंह फुलाते हुए घूंघट के भीतर से मैंने जवाब दिया था -“हम रात को दूध रोटी खाते हैं।”
“लो बबुआ जी! संभालो अपनी दूध रोटी को ।”जेठानी के कहते ही कमरे में एक तेज़ ठहाका गूंज उठा था।

देव!मैं जब नहा कर साड़ी पहने गिरते पड़ते रसोईघर में जाती और तुम चाय लेने आते तब मैं तुम्हारा मुंह ताकती कि अब तुम मेरी ओर ताकोगे, तुम्हारी आंखों में मेरे लिए ढेर सारा तैरता हुआ प्यार होगा… तुम्हारी आंखों की सुनहरी डोरियों में मुझसे एकांत मिलन की कामना होगी…एक बेहद शरारती सी तृष्णा होगी और तुम कोई काम का बहाना बनाकर मेरे ही पास बैठ जाओगे मुझे छेड़ते हुए परेशान करोगे और…और आंखों को सतर्कता से इधर-उधर घुमाते हुए…सबसे बचकर…छुपकर धीरे से मेरे गालों को…पर कहां…?तुम्हें तो मेरे लिए फुरसत ही नहीं थी मेरी अल्हड़ खुशी पर तुम जब तक भावशून्यता का पानी उड़ेल कर रख देते थे। मैं पति के रूप में एक चुलबुला दोस्त चाहती थी और तुम…तुम सिर्फ़ एक स्त्री चाहते थे…भावहीन…संवेदनहीन…सिर्फ़ एक स्त्री… जो मशीन की तरह काम करें,बच्चों की देखभाल करें और रात्रि की नीरवता में थकान से शिथिल,बेजान,निर्जीव से अपने शरीर को तुम्हारे अरमानों की शय्या पर सजा सके।

छुट्टियों में मैं कई बार कहीं बाहर घूमने का प्लान करती।
“चलो न देव! कहीं घूम कर आते हैं ऐसी जगह जहां केवल हमदोनों हों…कुछ खामोश लम्हें हो…कुछ तुम्हारी शैतानियां कुछ मेरी शोखियां हो…पर वहां भी तुम ऐसे खामोश रहते…जैसे किसी अजनवी के साथ तुम्हें बैठा दिया गया हो। न कोई प्यार… न कोई मनुहार…न मेरे रूप की तारीफ…क्योंकि जब तुम्हारा परिवार मुझे देखने आया था तो सासू माँ से लेकर जेठानी तक मेरे मासूम चेहरे पर रीझ गई थीं।सब कहते थे-”देव बहुत भाग्यवान है जो इसको ऐसी सुंदर सुशील कनिया मिली है।”
तुम्हारा हाथ पकड़कर,तुम्हारे कांधे पर सिर टिका कर चलना तुम्हें बचकानी बात लगती और गंभीरता का लबादा ओढ़े तुम्हारा व्यक्तित्व मुझे खिझलाहट भरा लगता। नतीजा…दिन के खत्म होते न होते हमदोनों का आरोप प्रत्यारोप लड़ाई और बहस पर आकर खत्म होता और फिर हम दोनों के बीच महीनों खामोशी की घनी,काली अमावस की रात पसर जाती ।

देव! मेरे प्रति तुम्हारा उदासीन रवैया मेरा जी जलाने के लिए काफी होता था। मैं बड़े घर की लाडली बिटिया थी,काम करने का कोई खास सलीका न था लेकिन न आते हुए भी हर काम करने की मेरी ललक से हर कोई खुश होता पर तुम्हें छोड़कर …छोटी सी बात पर भी महीनों तक तुम मुझसे बात न करते…मैं कुढ़ती रहती…छटपटाती रहती…अपनी गलतियां खोजती रहती पर तुम्हारा अहम कभी हार न मानता।

दो कमरों का घर धीरे-धीरे निर्जीव मकान में तब्दील होने लगा था। लेकिन मजाल है कि तुम्हें मेरी हालत पर दया आती…घर की घुटन से थककर,आंसू पोंछ मां की बातें याद कर “बिटिया!थोड़ा नरम रह कर रिश्ता संभाल लेना चाहिए इसी में औरत जात का भला है।” तुमसे फिर बोलना शुरू कर देती। लेकिन आग उस समय लग जाती जब मेरे आहत मन के घाव पर अपने स्नेह की मरहम पट्टी धरे बगैर मात्र शरीर की चाहत से रात्रि के सन्नाटे में तुम मेरे पास घिसट आते । झींगुरों की आवाज रात्रि की नींद में खलल डालती और तुम्हारी हरकत मेरे कोमल मन को आहत करती…उस समय मेरी अस्वीकृति से तुम्हें अंतर कहां पड़ता था? उस समय तुम्हारा रूप कितना अलग होता…प्यार के समंदर में डूबता एक समर्पित पति…नहीं… पति नहीं… तुम तो मात्र पुरुष होते थे उस समय…।

पर दिन के उजाले में तुम बिल्कुल अपरिचित लगते…मैं दिन प्रतिदिन तुम्हारे रूखे रवैए से उग्र से उग्रतर होती जा रही थी। छोटी-छोटी बात पर चिढ़ना,तुम्हें जी भरकर जली कटी सुनाना और जब मेरा ही शरीर कामनाओं से सुलग उठता तो अपने शरीर को चोटिल करना,अपने दहकते मन के अंगार से अंश(हमारा बेटा) के बचपन को आघात पहुंचाना…ये अब रोज का क्रम हो चुका था।स्थितियां बद्तर होती जा रही थीं और तुम मेरे मन से दूर… बहुत दूर…होते जा रहे थे।
तुम मेरे मुर्दा जिस्म से भी अपने देह के ज्वार को शांत कर लेते आँसुओं से तर हुए मेरे चेहरे से तुम्हारा कोई वास्ता न रहता। तुममें प्रेम की नहीं एक शरीर की तृष्णा थी। काश ! देव एक बार तो मेरा मन पढ़ लेते…!शरीर का क्या है! मन जीत लेते तो शरीर भी तुम्हारा ही था न!

देव! तुम कहोगे आज भी मैं शिकायत का पुलिंदा लेकर बैठी हूं। क्या करूं देव! हमारे समय में तो विवाह के बाद पति से ही प्रेम करने का चलन था न! मैं भी तो तुमसे प्यार ही चाहती थी न! जो तुमने कभी दिया ही नहीं पर…पर अब मैं मान चुकी हूं हर किसी के नसीब में प्यार नहीं होता। मेरे जैसे कई ऐसे अभागे भी होते हैं जो नदी किनारे रहकर भी आजीवन अतृप्त रहते हैं ।
देव !तुमने मुझे घाव देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।खैर! अब और कोई गिला शिकवा नहीं बस इस घुटन की जिंदगी को हमेशा के लिए अलविदा कह रही हूं। मेरे जाने के बाद ही ये पत्र तुम्हें मिलेगा। बस एक अंतिम इच्छा है… तुम मुझे मुखाग्नि मत देना। जो इंसान कभी मेरे कुम्हलाए चेहरे से कभी आहत न हुआ हो उससे भला संबंधों की अंतिम विदाई क्यों लूं?

तुम्हारी मृणाली …
नहीं ‘तुम्हारी’ तो मैं कभी हुई ही नहीं । तुमने इतना हक कहां दिया मुझे? इसलिए सिर्फ़
मृणाली…

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