
मंजुला श्रीवास्तव, प्रसिद्ध लेखिका
हम सपने देख रहे हैं सदियों से
गुड़िया की शादी से लेकर
टोले-मोहल्ले और अपनी शादी तक।
रोटी बनाते हुए
युवती से प्रौढ़ और बुढ़ापे तक।
स्कूल से कॉलेज और पीहर से
पी के घर तक, रोटी बनाते हुए,
सपनों के सफ़र को तय करते हुए।
बच्चे को जनते, स्कूल भेजते हुए,
उनकी टाई और जूतों की पॉलिश में,
बैग और टिफ़िन लगाते हुए,
टाटा-बाय-बाय करते हुए
और स्कूल के बाद
उनके घर आने,
सामान बिखेरने तक।
हम सपने देख रहे हैं,
रोटी बना रहे हैं
पहले से और ज़्यादा गोल और सुघड़।
ऑफिस, कॉलेज, बैंक और फैक्ट्री तक,
और तो और राजनीति के गलियारों तक।
चाय की हर घूँट में
आँखों की नमी पीते हुए,
धान की रोपाई में,
फल-सब्ज़ी के ठेले पर,
ईंट-गारे को ढोते हुए
रोटी बनाते हुए।
डोर-टू-डोर कपड़े बेचते,
सपने देखते हुए,
गर्मी, शीत और बरसात के थपेड़ों में।
पति की आदतों को सहते हुए,
बैग और टिफ़िन थमाते,
मार खाते हुए,
गालियों की चुभन की आदत में
रोटी बनाते हुए।
बेमेल शादी से तालमेल बिठाते,
रौबदार आवाज़ से चौंक-चौंक जाते,
बड़ी कार में पति की असहजता छुपाते,
सजे-धजे पार्टियों में
नकली मुस्कान बिखेरते हुए।
हम सपने देख रहे हैं
विदेशों में बस गए बेटों की याद में,
जो पास हैं, उनके तिरस्कार में।
वृद्धाश्रम में रहते हुए
अब रोटी नहीं बनाते।
मैं औरत हूँ,
जननी हूँ।
हम सपने देखते रहेंगे,
ताकि महकता रहे
घर, परिवार और संसार।
रोटी पहले से भी
ज़्यादा गोल और सुघड़
होती जाएगी।
हम सपने देख रहे हैं
और देखते रहेंगे।