ज्ञान का सागर

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नलिनी श्रीवास्तव नील, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली

क़स्बे के एक विशाल पुस्तकालय में ढेरों पुस्तकें देख मन ललचा गया। बचपन से ही पढ़ने का बेहद शौक़ था। शहर से आज अपने घर लौटा तो इतनी सारी पुस्तकें देख अपना बचपन भी याद आ गया।

“चाचा प्रणाम!” मोहित ने कहा।
“अरे! तुम… मोहित हो न? कितने बड़े हो गए … “
“… और चाचा आप भी तो अब बूढ़े से दिखने लगे। पर आपका पढ़ने का शौक़ वैसे का वैसा ही है।”
“ हाँ बेटा ! बचपन इतने अभावों में बीता कि पढ़ने के लिए न फ़ीस दी जा सकती थी और न ही किताबें ख़रीद सकता था।”

“ ओहो! फिर चाचा, ये सब किताबें कहाँ से मिलीं? “बेटा! माँ-बाप ने कबाड़ी का काम सिखाया था। कई बार कबाड़ में महंगी और ज्ञानवर्धक किताबें मिल जातीं थीं तो उसे कबाड़ी की दुकान पर बेचने का मन नहीं करता था। बस ऐसे ही धीरे- धीरे एक दिन ये लाइब्रेरी बन गई।“

“… और चाचा इस तरह आपने हर विषय और ज्ञान की तमाम किताबें एकत्र कर ली हैं।

“हाँ! बेटा, मेरे तो ज्ञान की भूख मिट जाती है।”

“जी चाचा… और इस ज्ञान के सागर से आप ग़रीब व ज़रूरतमन्द बच्चों का सपना भी आप पूरा कर देते हैं …”

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