भव्य बंगले में जन्मदिन समारोह के बाद अकेली बैठी एक महिला, जिसके पास उसकी बहू सहानुभूति से बैठी है, रिश्तों और मानवता का भावनात्मक दृश्य।

सुनहरी ज़ंजीरें

मुंबई के पॉश इलाके में समुद्र के किनारे बना “रत्नालय” दूर से किसी महल जैसा दिखाई देता था। ऊँची दीवारें, चमचमाती काँच की खिड़कियाँ, विदेशी गाड़ियाँ और हर समय आने-जाने वाले लोगों की भीड़—ये सब कुछ उस आलीशान घर की हैसियत बयान करती थीं।

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शब्दों का आचरण

यह लघुकथा ज्ञान और आचरण के अंतर को उजागर करती है। जो ऋषि संसार को करुणा का उपदेश देता है, वही अपने घर में उसे जी नहीं पाता। अंततः शब्दों की खोखली चमक टूटती है और सच्चे आत्मबोध का जन्म होता है पर एक अपूरणीय क्षति के साथ।

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