
रीता मिश्रा तिवारी, प्रसिद्ध लेखिका, भागलपुर, बिहार
बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं,
क्या लिखूँ समझ नहीं आता।
ग़ज़ल, कोई गीत या दोहा,
छंद या फिर मुक्तक
कुछ भी नहीं…
ये जीवन है,
जहाँ दुःख-दर्द और खुशियाँ हैं।
यही तो ज़िंदगी के तराने हैं,
गीतों के सरगम हैं।
दोहे की पंक्तियों में जीवन का सार है,
ग़ज़ल तो एक पहेली है,
छंद और मुक्तक की बात निराली है…
आज के बाद
कल का दिन नया होगा।
पेड़ की छाँव में सूरज होगा,
प्रकृति का सौंदर्य
और शीतल बयार में
बसंत की खुशबू होगी।
पक्षियों के कलरव में
सुगम संगीत होगा,
तभी तो
पुलकित हृदय में
कविता का आगमन होगा…
कल की सुबह
दिन के बाद रात थी।
सितारों के बीच चाँद लुप्त था,
बादल था, बरसात नहीं थी।
यही फ़र्क़ है
कल भी मैं थी, आज भी मैं हूँ,
और
कल भी मैं ही रहूँगी,
क्योंकि मैं
कविता हूँ।
कविता जो दिखाती संसार कविता ही जीवन का सार। 💐🙏🙏बहोत सुंदर प्राकृति का दृश्य बहोत सुंदर रचना।