अदृश्य पहरा

किशोरावस्था की मानसिक उलझन और मध्यांतर की अवस्था को दर्शाती संवेदनशील हिंदी कविता

रुचि अग्रवाल, प्रसिद्ध लेखिका, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)

ना बीता बचपन, न आई जवानी,
ये मध्यांतर की अवस्था है।
बीच भँवर में गोते खाती,
अस्पष्ट सी किशोरावस्था है।

बदल गई आवाज़ गले की,
बदल रही हैं आदतें।
हमें समझने की जगह,
मिलती हरदम हिदायतें।

साथ रहें तो ज्ञान की पोथी
लेकर सब चढ़ जाते हैं।
एकांत की चाह जताएँ तो,
सब हमसे चिढ़ जाते हैं।

चटपटे, मनभावन भोजन पर
भी रोक लगाते हैं।
ये चस्का नहीं, समय की माँग है,
ये क्यों नहीं समझ पाते हैं।

रात में समय पर सोना—
कहते यही दस्तूर है।
उन लम्हों में ही हम खुलकर जीते,
क्या यह भी कोई कसूर है?

दिन भर पीछे हरदम कोई
ज्ञान बघारता जाएगा।
ऐसे हालातों में भला कोई
कैसे खुलकर जी पाएगा?

पढ़ना, खाना, सोना, उठना
हर जगह पर पहरा है।
कहीं आने-जाने, फोन पर भी
माँ-बाप का कर्फ़्यू गहरा है।

ऐसे हालातों के कारण
स्वभाव बिगड़ जाता है,
और घरवालों का सारा इल्ज़ाम
नए ज़माने की हवा पर जाता है।

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