
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज
क्विक कॉमर्स कंपनियों द्वारा10 मिनट में डिलीवरी जैसे दावों को हटाना सिर्फ एक विज्ञापन रणनीति में बदलाव नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता पर लगाम है, जिसमें मुऩाफे और प्रतिस्पर्धा की होड़ में इंसानी जान को नजरअंदाज़ किया जा रहा था. ब्लिंकिट, स्विगी और जेप्टो जैसी कंपनियों का यह कदम सरकार की सख्ती, डिलीवरी राइडर्स की नाराज़गी और लगातार हो रही सार्वजनिक आलोचना के बाद सामने आया है. पिछले कुछ समय से यह सवाल ज़ोर पकड़ रहा था कि क्या सुविधा की इस अंधी दौड़ में सड़क सुरक्षा और श्रमिकों की ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं है? 10 मिनट डिलीवरी केवल एक टैगलाइन नहीं थी, बल्कि एक ऐसा दबाव था जो राइडर्स को तेज़ रफ्तार, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी और जोखिम भरे फैसलों की ओर धकेलता था. इसका असर सिर्फ डिलीवरी कर्मियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सड़क पर चलने वाले आम नागरिक भी इसकी चपेट में आते रहे.
केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया का यह स्पष्ट कहना कि कोई भी बिजनेस मॉडल वर्कर्स की जान जोखिम में डालकर नहीं चल सकता, एक अहम और साहसिक संदेश है. सरकार द्वारा गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा और बेहतर कार्य स्थितियों पर नीति बनाने की घोषणा यह दर्शाती है कि अब इस वर्ग को ङ्गअदृश्य श्रमफ मानकर नहीं छोड़ा जा सकता.
इस पूरे घटनाक्रम में पंजाब से राज्यसभा सांसद और आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा की भूमिका भी उल्लेखनीय रही. उन्होंने न सिर्फ इस मुद्दे को लगातार उठाया, बल्कि क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स की 10 मिनट डिलीवरी ब्रांडिंग को असंवेदनशील बताते हुए सरकार से हस्तक्षेप की मांग की. फैसला आने के बाद उनका यह कहना सत्यमेव जयते. साथ मिलकर, हम जीत गए दरअसल उन हजारों राइडर्स की आवाज़ है, जिनकी सुरक्षा लंबे समय तक अनसुनी रही.
कंपनियों का यह दावा कि वे ऑपरेशनल एफिशिएंसी बनाए रखेंगी, लेकिन अवास्तविक समय-सीमा का वादा नहीं करेंगी, स्वागतयोग्य है. तेज़ सेवा और सुरक्षित सेवा के बीच संतुलन ही किसी भी आधुनिक और जिम्मेदार बिजनेस की पहचान होनी चाहिए.
अब चुनौती यह है कि यह बदलाव केवल ब्रांडिंग तक सीमित न रह जाए. ज़रूरत इस बात की है कि ज़मीनी स्तर पर राइडर्स पर पड़ने वाला दबाव कम हो, उन्हें बीमा, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां मिलें. यदि ऐसा नहीं हुआ, तो टैगलाइन बदलेगी, हालात नहीं. 10 मिनट डिलीवरी का अंत एक स़ाफ संदेश देता हैविकास की रफ्तार इंसान से बड़ी नहीं हो सकती. सुविधा की कीमत यदि किसी की जान बन जाए, तो वह सुविधा नहीं, असंवेदनशीलता है. यह फैसला राइडर्स की सुरक्षा, सड़क की समझदारी और जिम्मेदार व्यापार की दिशा में एक ज़रूरी कदम है.