
मेघा अग्रवाल
फिर एक दिसंबर जा रहा।
कुछ साथी मिले, कुछ बिछड़ गए,
यादों की किताब में यादें लिख चले।
फिर एक दिसंबर जा रहा…
अरमानों की ट्रेन में मंज़िल पाने दौड़ रहे,
स्टेशन पीछे छूट रहे, आख़िरी पड़ाव को पाने।
फिर एक दिसंबर जा रहा…
कुछ पा लिया, कुछ पाना शेष रहा,
गए वक़्त के साथ उम्र का हिस्सा घटता रहा।
फिर एक दिसंबर जा रहा…
यादों की गठरी बनाकर मैंने
मचान पर बाँध दिया,
जनवरी आने से पहले
खूँटी पर टाँग दिया।
फिर एक दिसंबर जा रहा…
बूढ़ा दिसंबर
अपने साथ खट्टी-मीठी यादें बाँट रहा,
जनवरी के आते ही
नई किरणें बिखेर रहा।
फिर एक दिसंबर जा रहा…